“जानवरों से बचाने जंगल पर कब्ज़ा किया” -इंड सिनर्जी.. साढ़े सात एकड़ सरकारी जमीन का मामला..! देखें फैक्ट्स..

रायगढ़।

“जानवरों से बचाने जंगल पर कब्ज़ा किया ” -इंड सिनर्जी

यही कहना है रायगढ़ जिले में महापल्ली स्थित इंड सिनर्जी लिमिटेड का। यह वृहद् स्टील उद्योग अपने स्थापना काल से ही विवादों में रहा है। कभी मजदूरों की वेतन और दुर्घटनाओ के लिये तो कभी जल कर की करोड़ों की राशी न देने को लेकर।

ताजा मामला वन भूमि पर अतिक्रमण को लेकर है। अनेक शिकायतों और मिडिया की ख़बरों के बाद प्रशासन जागा और संबंधित पटवारी को स्थल जांच का आदेश दे दिया।

क्या कहते हैं फैक्ट्स

कुल ९० एकड़ में से साढ़े सात एकड़ से ज्यादा छोड़े बड़े झाड़ के जंगल पर कंपनी का कब्ज़ा पाया गया। फारेस्ट कंजर्वेशन एक्ट १९८० के अनुसार और समय समय पर सुप्रीम कोर्ट के दिये आदेशानुसार छोड़े बड़े झाड़ के जंगल को भी वन भूमि माना गया है और इसका उल्लंघन किये जाने पर सजा का प्रावधान है। वनों की समुचित रक्षा के लिये राज्य शासन जिम्मेदार होता है और जब कभी वन भूमि पर अतिक्रमण का मामला सामने आता है तो प्रथम दोषी भी राज्य शासन को ही माना जाता है। कोर्ट में ऐसे मामलों में राज्य सरकार को पहले फिर कंपनी को आरोपी बनाया जाता है।

प्रतिवेदन भाग 1

लेकिन इस मामले की जानकारी न तो राज्य के मुख्य सचिव को दी गई और न वन विभाग के उच्च अधिकारीयों को।

प्रतिवेदन भाग 2

स्थानीय तहसीलदार स्तर पर ही सामान्य कब्जे जैसा मामला दर्ज कर महज खानापूर्ति पूरी की जा रही है। ऐसे राजस्व मामले के निपटारे में १०-२० साल लग जाना सामान्य सी बात है। मतलब तब तक वन भूमि कंपनी के कब्जे में ही रहेगी।

यदि कंपनी को वन भूमि की आवश्कता थी ही तो इसके लिये फारेस्ट कंजर्वेशन एक्ट १९८० की धारा २ के तहत बाकायदा केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी लेनी थी। लेकिन यह प्रकिया इतनी आसान नहीं होती। इसलिये अधिकांश कंपनिया अतिक्रमण का रास्ता अपनाती हैं।

गोल्डमेन एनवायरमेंट प्राइज विजेता और जन चेतना सदस्य रमेश अग्रवाल का कहना है कि

“इंड सिनर्जी जैसा ही एक मामला डभरा तहसील स्थित डी.बी.पावर लिमिटेड का भी जन चेतना के सामने आया था और चूँकि मामला वन भूमि के अतिक्रमण से संबंधित था इसलिये शासन प्रशासन स्तर पर कोई कार्यवाही नहीं होने पर मजबूरन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में पिटीशन लगाई है। “