रायगढ़/ कोरोना पीड़ित की मौत के बाद का तमाशा, झकझोर कर देने वाली समाज और जिम्मेदारों की तस्वीरें, कैसे और किस जगह, किस तरीके से हुआ उसका अंतिम संस्कार, देखें वीडियो..

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रायगढ़/ करोना काल में एक और जहां इंसानियत की कई तस्वीरें  सामने आई, वहीं दूसरी तरफ मानव समाज को झकझोर कर देने वाली तस्वीरें भी पटल पर आयी। ऐसे ही एक हाल की तस्वीर रायगढ़ से भी देखने को मिली। 11 जुलाई को करोना पीड़ित की मौत हो गई। प्रशासनिक अमला पीड़ित मरीज के इलाज को लेकर श्मशान में ससम्मान दाह संस्कार के लिए गया। मगर कोरोना का भय से स्थानीय लोगों ने वहां दाह संस्कार करने पर विरोध किया। इसके बाद प्रशासन ने रामपुर कचरा डंप यार्ड मे ले जा कर जलाया।

उस पीड़ित का जीवनकाल कैसा रहा, इसके बारे में तो हम कुछ खास नहीं जानते, मगर मरने के बाद उसकी लाश के साथ जो हुआ वह वाकई झकझोर कर देने वाला है। प्रशासन जब उसे सम्मानित रूप से दाह संस्कार के लिए मसान ले गया तो लोगों ने वो सम्मान छीन लिया। यह वही लोग है, जिनको इस महामारी का डर तो है मगर जब वो बाजार निकलते हैं, तो बेखौफ हो जाते हैं।

प्रशासन को भी अच्छी ना सही, मगर कोई ठीक-ठाक जगह भी नहीं दिखी। एक ऐसी जगह उसकी लाश को जलाया गया। जहां पूरे शहर का कचरा फेंका जाता है। लाश को जलाने के लिए लकड़ी के साथ-साथ आसपास कचरे के ढेर से गत्तों, प्लास्टिक की थैलियों का सहारा लेना पड़ा। वह पूरा दृश्य मानो ऐसा लग रहा था जैसे कोई इंसान नहीं, किसी कचरे को जलाया जा रहा है। संवेदना यहां भी नहीं दिखी। देखें वीडियो

लाश के अंतिम संस्कार के लिए गया प्रशासनिक अमले में सभी पीपीई किट से लैस थे, अच्छी बात है। मगर कुछ लोग बरसाती में दिखे। उनके हाथ में दस्ताना भी नहीं था और ना ही जूता, बरसाती पहने हुए आसपास से लाश की लकड़ी को जलाने के लिए कचरे के ढेर से कुछ के ढूंढते आ रहे थे। इनके अंदर करोना का भय नहीं दिखा। शायद इन्हें पीपीई किट की आवश्यकता नहीं। समझते देर न लगी कि शायद निचले दर्जे के कर्मचारी या ठेका मजदूर हो सकते हैं।

इस पूरे मामले को संज्ञान में लेते हुए रायगढ़ के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ राजू ने जनता प्रशासन को एक सीख देते हुए कहा कि

जिस मरीज की मृत्यु हुई है उसका 21 जून से लकवा एवं ब्रेन की गंभीर बीमारी का इलाज चल रहा था, उसका 24 जून को कोरोना पाजिटीव आया, अर्थात उसकी मृत्यु लगभग 16 दिन बाद हुई, उसकी मृत्यु कोरोना इन्फेक्शन के कारण होना प्रतीत नहीं होता है । इसका मतलब उस मरीज की मृत्यु ब्रेन की बीमारी एवं लकवा के कारण होना नजर आता है।

प्रशासन के द्वारा समय रहते इस बात को सही तरीके से जनता के समक्ष नहीं रखा गया। जिसके कारण बेलादुला श्मशान घाट में उसके शव को जलाने का विरोध हुआ, जो कि सामाजिक एवं नैतिक रूप से उचित नहीं है । यदि प्रशासन मृत्यु का कारण स्पष्ट करता और वहां के लोगों को समझाता तो यह स्थिति शायद नहीं आती। यदि आने वाले समय में भी ऐसी कोई मौत होती है तो जनता भी इस बात को समझे की ऐसा विरोध उचित नहीं है । जनता को यह समझना होगा कि कोरोना संक्रमित शव के शमशान में सावधानी पूर्वक दहन से किसी भी प्रकार से संक्रमण का खतरा जनता को नहीं है।