इस गांव के हर घर में नींबू व नीम का पेड़ है ! कोरोना की दोनों लहरों के बीच यहां अब तक एक भी व्यक्ति नहीं हुआ है संक्रमित.. पढ़े खबर..!

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गोरखपुर, 05 मई। पुरखों से मिली परंपरा को श्रद्धा का संरक्षण मिले तो वह आशीर्वाद के रूप में हमेशा नई पीढ़ी के लिए कवच बन जाती है। सिद्धार्थनगर जनपद के बढऩी का पथरदेईया गांव इसका जीता-जागता उदाहरण है, जहां कोरोना वायरस का संक्रमण फटक भी नहीं पाया। कारण, गांव में पुरखों के लगाए नीम और नींबू के पेड़ कोरोना के खिलाफ हकीम बने हुए हैैं। करीब 18 सौ की आबादी और 70 घर वाले इस गांव के तकरीबन हर घर में नीम और नींबू का पेड़ है। नीम की नर्म पत्तियां और नींबू उनके दैनिक खानपान में शामिल है।

25 फीसद आबादी प्रवासी

खानपान और वातावरण का असर ही है कि करीब 25 फीसद आबादी प्रवासी होने और निरंतर आवागमन के बाद भी इस गांव में कोई संक्रमित नहीं हुआ। यहां चार सौ से अधिक लोग शहरों में काम करते हैैं। कोरोना संक्रमण की पहली लहर में सभी गांव लौटे। दो सप्ताह तक क्वांरटाइन रहे। खानपान में नींबू और नीम को शामिल करते रहे। दो बार जांच हुई और दोनों बार सभी की रिपोर्ट निगेटिव आई। दूसरी लहर में भी करीब तीन सौ प्रवासी गांव लौटे। पहले तो सेल्फ क्वारंटाइन रहे, फिर खानपान का ध्यान रखा। नतीजा, कोई भी संक्रमित नहीं हुआ।

घर बनाने के साथ इन्होंने शुरू की थी नीम व नींबू पेड़ लगाने की परंपरा

निवर्तमान जिला पंचायत सदस्य निरंकार सिंह बताते हैं कि गांव में नीम व नींबू का पेड़ लगाने की शुरूआत करीब 80 साल पहले उनके बाबा ठाकुर मनबहाल सिंह ने की थी। वह इटवा से आकर यहां बसे थे। इस परंपरा को उनके बड़े पुत्र दुखहरण सिंह ने आगे बढ़ाया और धीरे-धीरे गांव को नीम और नींबू की अहमियत समझ में आने लगी। कुछ घर, जहां पेड़ लगाने की जगह नहीं है, उन्हें छोड़कर हर घर में नीम का पेड़ है। 50-55 घरों में नींबू का पेड़ है। जिनके यहां नीम या नींबू का पेड़ नहीं है, वह दूसरे के यहां से बेहिचक ले सकते हैैं।

गांव में नीम की नर्सरी भी है

निरंकार सिंह के घर पर नीम की नर्सरी भी है। यहां प्रति वर्ष नीम और नींबू की पौध तैयार की जाती है। उन्हें मुफ्त में बांटा जाता है। आसपास के ग्रामीण भी पौधे ले जाते हैैं। गांव के चारो तरफ आम, कदंब और नीम के पेड़ लगे हैैं, जो वातावरण को आक्सीजन देते हैैं, शुद्ध रखते हैैं।

आक्सीजन की कमी के बीच भी पेड़ों का महत्व अब भी नहीं आ रहा है लोगों की समझ में

वर्तमान में सबसे बड़ी मुसीबत ग्लोबल वार्मिंग की समस्या है। पौधारोपण अगर एक क्रम में किया जाए तो सुंदरता की झलक भी दिखाई देगी। पेड़ों को काटने से पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसकी वजह से जैव विविधता की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। हमें अपने पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए कम पेड़ों की कटाई करनी चाहिए और प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होना चाहिए कि हमारे आसपास होने वाले पेड़ों की कटाई को रोके और जितना हो सके पेड़ों का सृजन भी करते रहना चाहिए जिससे हमारा भविष्य और उज्जवल और सुंदर होगा और हमें आगे चलकर किसी तरह की पर्यावरण से तकलीफ का सामना नहीं करना पड़ेगा। कोरोना काल में ऑक्सीजन की कमी का एहसास लोगों को हो रहा है।

पेड़ पौधे ही ऑक्सीजन देकर जीवन का सृजन व बचाव करते हैं इसलिए पेड़ो की कटाई को तत्काल रोककर पौधरोपण को युद्ध स्तर पर प्राथमिकता देना जरूरी हो गया है। भारत सरकार एवं राज्य सरकार को समझना होगा की कोरोना वायरस की आपदा भी प्रकृति की नाराजगी का ही एक रूप है। समय रहते हमें हमारे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को रुकना होगा तथा पेड़ पौधे लगाने व उन्हें सहेजने हेतू कड़े से कड़े नियम बनाने पड़ेंगे। उद्योगों को जितनी प्राथमिकता भारत सरकार दे रही है उससे कई गुना अधिक प्राथमिकता पौधरोपण व पेड़ो वनो के संरक्षण को देना चाहिए ताकि प्रकृति का संतुलन बना रहे और मानव जीवन में किसी प्रकार की कोई अड़चन ना आये।

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