बंद के साथ ही खोलने की कवायद शुरू रुपानाधाम स्टील की ! अचानक से लग गए 150 से 26000 पेड़ ? दो-तीन दिनों में तालाब भी पूरा साफ, 5 दिनों में सब कुछ हो गया सही? पढ़ें पूरी खबर

1,262 views

रायगढ़: उद्योगों को नोटिस देने का पुराना खेल न जाने कब से चल रहा है। किसी किसी को बंद भी करवाया जाता है, लेकिन इधर बंद करवाया तो उधर खोलने की प्रक्रिया चालू भी हो जाती है। ऐसा ही मामला है रायगढ़ के सराईपाली-गेरवानी स्थित रुपानाधाम स्पंज आयरन उद्योग का।

मिडिया में लगातार ख़बरें आने पर पर्यावरण विभाग ने 18 जनवरी को नोटिस देकर उद्योग बंद करवा दिया। खूब वाहवाही भी ले ली। लेकिन परदे के पीछे से खोलने की कवायद भी शुरू हो गई। 2-3 दिन में ही उद्योग ने सारी खामियां आश्चर्यजनक तरीके से पूरी कर ली। जिस तालाब के प्रदूषित पानी से मछलियाँ मर रही थी उसे भी साफ करवा कर शायद पंप से दूसरा साफ पानी भर दिया !

पर्यावरण स्वीकृति की शर्त के अनुसार २७ एकड़ में फैले वृहद् उद्योग में लगभग ९ एकड़ में ग्रीन बेल्ट विकसित करना था। कंपनी ने ३-४ दिन में ही इस शर्त को भी पूरा कर दिया लगता है ! शायद अब ९ एकड़ में हरे हरे घने वृक्ष विकसित हो गये होंगे ! इसके अलावा भी रायगढ़ पर्यावरण विभाग ने कई खामियां पायी थीं जिन्हें दूर कर लिया गया होगा। न केवल दूर कर लिया होगा बल्कि रिपोर्ट भी सदस्य सचिव छ.ग.पर्यावरण सरंक्षण मंडल रायपुर को भेज भी दी। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सदस्य सचिव ने भी ने भी बिना देरी किये दिनांक २३.०१.२०२१ को रायगढ़ पर्यावरण विभाग को उद्योग को फिर से चालू करवाने निर्देश दे दिया। मतलब कुल पांच दिनों में सारी खानापूर्ति पूरी? अब तो बस कुछ समय की बात है जब ग्रामीण फिर से चिमनीयों से जहर उगलते धुएं को देख देख कर परेशान होने लगेंगे !

जन चेतना सदस्य और गोल्डमेन एनवायरमेंट प्राइज विजेता रमेश अग्रवाल ने तो पर्यावरण विभाग द्वारा निरिक्षण रिपोर्ट के आधार पर बंद करवाने के नोटिस पर ही सवालिया निशान लगा दिया। उनका कहना है कि उनके द्वारा कई गंभीर खामियों को लेकर रायगढ़ जिला कलेक्टर एवं मुख्य सचिव को शिकायत प्रेषित की गई थी जिसमें ग्रीन बेल्ट का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया था। पर्यावरण विभाग की स्वयं की रिपोर्ट में सन २०१८ में मात्र १५० पेड़ थे। फिर उद्योग द्वारा किसी नामालूम संस्था की रिपोर्ट पेश कर दी जिसमें अचानक १५० पेड़ बढ़कर २६००० हो गये ! सवाल उठता है कि पर्यावरण विभाग की जो टीम निरीक्षण करने गई थी उसने अपनी रिपोर्ट में इस बाबत कोई उल्लेख क्यों नहीं किया ?