रायगढ़ / नव दुर्गा फ्यूल, रूपानधाम व सुनील इस्पात से होने वाले प्रदूषण का दंश झेलने को मजबूर हैं सराईपाली वासी ! यहाँ साफ पानी भी नहीं नसीब, तो सड़कें हो चुकी है जर्जर.. मवेशी हो रहे बीमार… पेड़ों पर छाई है डस्ट की परत..

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रायगढ़। औद्योगिक नगरी कहे जाने वाले रायगढ़ जिले के तमनार ब्लाक अंतर्गत आने वाले गांव सरायपाली में लोग बाग इन दिनों आसपास के क्षेत्रों में स्थित नवदुर्गा फ्यूल, रूपानधाम व सुनील इस्पात के चिमनियों से निकलने वाली विषाक्त धुंए से परेशान हो चुके हैं।  ग्रामीणों को नहाने के लिए स्वच्छ पानी तक नसीब नही हो रहा है। चिमनियों से निकलने वाली धुएं से आसपास का वातावरण पूरी तरह से प्रदूषित हो चुका है।

नहाने धोने के लायक भी नही रहा पानी

दैनिक दिनचर्या में स्नान हेतु उपयोग में लाए जाने वाले तालाब के पानी के ऊपर डस्ट और चिमनियों से निकलने वाली विषैले धुएं का एक काली पट्टी जम चुकी है। जिसमें लोग बाग नहाने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

पानी पर जमी डस्ट की परत

ओवरलोडिंग वाहनों के चलने से सड़क जर्जर

सरायपाली के ग्रामीणों ने बताया कि कंपनियों की ओवरलोडिंग वाहनों के चलने से क्षेत्र की सड़कें बर्बाद हो चुकी है। सड़कों में बन चुके बड़े-बड़े गड्ढे और उड़ने वाली धूल से लोग परेशान हो चुके हैं ।कंपनी अपने सुविधा के लिए प्लांटों से निकलने वाली मिट्टी और राखड़ डस्ट से सड़को में बन चुके गड्ढे को भरवा कर समतल कर देती है परंतु कुछ दिनों बाद उससे धूल उड़ने लगती है जिससे लोग बाग रास्ते में आने जाने के समय धूल से परेशान हो जाते है।

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पर्यावरण विभाग को समस्या से निदान हेतु दिया गया था ज्ञापन

पूर्व में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण को देखते हुए सरायपाली के ग्रामीणों द्वारा जिला पर्यावरण संरक्षण मंडल रायगढ़ को ज्ञापन सौंपकर क्षेत्र में हो रहे प्रदूषण के बारे में अवगत कराया गया था परंतु पर्यावरण विभाग अभी तक कोई उचित कार्यवाही नहीं कर पाई है। कार्यवाही के अभाव में  आज तक सरायपाली के ग्रामीण पर्यावरण  प्रदूषण का ध्वंश झेलने को मजबूर हैं।

ग्राम पंचायत द्वारा पहले भी किया जा चुका है आगाह

ग्राम पंचायत सरायपाली द्वारा बैठक में प्रदूषण को लेकर लिया गया निर्णय

इसी साल के अप्रैल माह के अंत में ग्राम पंचायत सरायपाली में सरपंच के अध्यक्षता में इस डस्ट से होने वाले नुकसान रोकथाम और निवारण के लिए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया। बैठक में इन उद्योगों से उड़ने वाले डस्ट से तालाब में नहाने वाले से उनके मवेशी बीमार हो रहे हैं इसके साथ ही पेड़ पौधे भी प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं, मगर दिसंबर के माह में भी नजारा लगभग वैसा ही है।

तालाबों पर डस्ट की एक परत जमती जा रही है। इसका सीधा सीधा मतलब है कि इन उद्योगों द्वारा पर्यावरण के नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। पर्यावरण विभाग संज्ञान होने के बावजूद भी पर्यावरण को लेकर कोई खास रुचि नहीं रख रहा। पर्यावरण के प्रति जागरूकता के नाम पर सिर्फ दिखावा और खानापूर्ति हो रहा है।