केंद्र सरकार का उद्योगों को एक और तोहफा ! कॉर्पोरेट एनवायरमेंट रेस्पोंसिबिलिटी (सीइआर) खत्म !

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उद्योगों पर मेहरबान केंद्र सरकार लगातार पर्यावरण की कीमत पर भी उद्योगों को छूट पर छूट दिये चली जा रही रही। इसके पहले इ. आई. ऐ. नोटिफिकेशन २००६ के स्थान पर नोटिफिकेशन २०२० का ड्राफ्ट लेकर आई। जिसमें कई उद्योगों को जन सुनवाई से अलग रखा गया। यही नहीं पर्यावरण स्वीकृति के बिना उद्योग को कार्य शुरू करने की मौन स्वीकृति दे दी गई। अभी तक इसे गैर क़ानूनी माना जाता रहा है और उद्योग पर क़ानूनी कार्यवाही होती रही है।

पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओ के विरोध और मामला कोर्ट पहुँच जाने के कारण सरकार नोटिफिकेशन २०२० को अभी लागू नहीं कर पायी है।
अब ३० सितम्बर २०२० को केंद्र सरकार ने अपने ही १ मई २०१८ के उस आदेश को रद्द कर दिया। जिसके द्वारा उद्योगों पर सीइआर आरोपित किया गया था। इस आदेश में व्यवस्था थी कि उद्योग द्वारा किये गये इन्वेस्टमेंट का दो प्रतिशत तक इस मद में खर्च करना होगा। इस राशी का उपयोग उद्योग प्रभावित क्षेत्र में पीने का पानी, सेनीटेशन, स्वास्थ्य, शिक्षा सड़क निर्माण इत्यादि कार्यों खर्च में करना था।


कंपनी एक्ट में सीएसआर का प्रावधान है जिसके अनुसार उद्योगों को अपने प्रॉफिट का कुछ परसेंटेज जन कल्याणकारी कार्यों में लगाना होता है। २०१८ में आदेश लाते समय सरकार का कहना था कि कंपनी एक्ट के दायरे में सभी उद्योग नहीं आते। ये केवल उन उद्योगों पर लागू होते हैं जो चालू हो चुके हैं और अच्छा खासा मुनाफा कमा रहे हैं।


अब इसे ख़त्म करते समय यह वयवस्था की गई है कि स्वीकृति देते समय ही ऐसे प्रावधान रखे जायेंगे कि जन सुनवाई में उठाये गये मुद्दों और उद्योग द्वारा किये गये वायदों को पूरा करने की अलग से शर्त रखी जायेगी |
जिस देश में पर्यावरण स्वीकृति की शर्तो की मानिटरिंग और पूरा करवाने के लिये कोई तंत्र ही नहीं हो वंहा यदि एक और शर्त जोड़ भी दी जाती है तो क्या फर्क पड़ने वाला है।


हालात ये हैं कि कोई भी उद्योग इन शर्तों का पालन नहीं करता क्योंकि उनको मालूम है कि पूरा करवायेगा कौन | यही कारण है कि देश में आज प्रदुषण की स्थिति बद्तर होती जा रही है। प्रदुषण के लिये केवल उद्योग ही जिम्मेदार हों ऐसा भी नहीं है और भी कई कारण हैं जिनसे प्रदुषण फैलता है। जैसे कि बढते वाहनों की संख्या, किसानों द्वारा पराली जलाया जाना।इसके अलावा हम सब भी कंही न कंही इसके लिये जिम्मेदार हैं।


बहरहाल सीएसआर कहो या सीइआर, लेखक की राय में ये सुई का दान और सब्बल की चोरी जैसा ही है !

रमेश अग्रवाल