कोरोना महामारी में बायो मेडिकल वेस्ट एक गंभीर चुनौती ! जिनके पास जल प्रदुषण नापने उपकरण नही; वो कैसे इस खतरनाक अपशिष्ट का निपटान करेंगें..??

रमेश अग्रवाल@रायगढ़। हॉस्पिटल एवं पेथोलोजी सेंटर से निकलने वाले खतरनाक अपशिष्ट संक्रमण युक्त पदार्थ शुरू से ही एक गंभीर समस्या रही है। रायगढ़ जिले में कभी भी इसकी सुचारू व्यवस्था रही ही नहीं। एक अरोमा कम्पनी के पास ठेका था, जिसके पास तथाकथित रूप से रायगढ़ एवं जशपुर जिले के लगभग 150 हॉस्पिटल व् लेब का काम था, जो कि आश्चर्यजनक तरीके से प्रतिदिन इतने सेंटर से मात्र एक वाहन में वेस्ट एकत्र भी कर लेता था और निपटान भी कर देता था ! लेकिन उसका भी लाइसेंस बाद में रद्द हो गया। उसके बाद पर्यावरण विभाग ने उसे बिना लाइसेंस काम करने मना लिया ताकि वो हरमाह रिपोर्ट बना कर देता रहे और विभाग की जान बची रहे !

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इसे अति गंभीर मानते हुए सभी राज्य सरकारों से एक वर्ष के भीतर सेंटर स्थापित करने आदेश किया। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात ! ट्रिब्यूनल के आदेश के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने इसका जिम्मा क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारीयों पर डाल दिया। उसके बाद शुरू होती है टेंडर की कार्यवाही। पहले तो लोगों ने इसमें रुची ही नहीं दिखाई। एक तो काम के लिए एक्सपर्ट आदमियों का ना मिलना और दूसरा हॉस्पिटल से पैसे वसूलना।

आज इस कोरोना महामारी के समय में सहज ही सवाल उठता है कि हॉस्पिटल एवं पेथोलोजी सेंटर से निकलने वाले पीपी किट, ग्लब्स, खतरनाक इंजेक्शन एवं अन्य संक्रमण युक्त सामान का निपटान कैसे किया जाता है..? कारण कि वर्तमान तक रायगढ़ में एक भी सेंटर चालू नहीं है, रायगढ़ नगर निगम ने कुछ जगह जरुर दी है लेकिन सेंटर बनना अभी दूर की कोड़ी है।

बहरहाल एनजीटी ने याचिका क्र. ७२/२०२० में दिनांक २१.०४.२०२० को राज्य प्रदुषण नियन्त्रण बोर्ड को कोविड-१९ वेस्ट  का वैज्ञानिक तरीके से निपटान करने आदेश दिया है।  जिनके पास जल प्रदुषण नापने उपकरण नहीं हैं वो कैसे इस खतरनाक अपशिष्ट का निपटान करेंगें ये एक यक्ष प्रश्न है! 

रमेश अग्रवाल

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