रायगढ़/ निगम के चिराग तले अंधेरा..? विज्ञापनों का कूड़ेदान बनता शहर का इकलौता ओवर ब्रिज ! किसकी मेहरबानी और आदेश से पोत दिया जाता है विज्ञापनों से..

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रायगढ़। किसी शहर के बीच बने ओवर ब्रिज शहर के विकास और प्रगति का प्रतीक होते हैं। यह बड़े-बड़े ओवर ब्रिज सिर्फ यातायात को ही नहीं संभालते, बल्कि उस शहर की सुंदरता और भव्यता का प्रदर्शन करते हैं। रायगढ़ शहर में भी एक ब्रिज है या फिर यह कह लीजिए कि एकलौता ओवर ब्रिज है। जो शहर के सबसे व्यस्ततम मार्ग  पर बने निगम कार्यालय से शुरू होता है और जुटमिल कयाघाट पर जाकर खत्म होता है। इस ओवर ब्रिज की लंबाई लगभग 400 मीटर है। इस पुल को जितनी भव्यता  मिलनी थी। यह उसकी रत्ती भर भी नहीं है। पुल के नीचे पार्किंग का अड्डा है। अगर ओवरब्रिज की सड़क पर जाएं तो आपको वहां गड्ढे दिख जाएंगे।

ओवरब्रिज में बने गड्ढों के मरम्मत की बात आने पर निगम अमला यह कहता है कि यह लोक सेतु निर्माण करेगा जबकि सेतु निर्माण विभाग द्वारा 3 जुलाई 2013 को पत्र लिखकर इसे नगर पालिक निगम के अधिपत्य में सौंप दिया गया है।

सेतु निर्माण मंडल द्वारा रायगढ़ नगर निगम को ओवर ब्रिज हैंड ओवर के लिए दिया गया पत्र

हास्यास्पद बात यह है कि इस ब्रिज पर अपना अधिपत्य नहीं होने की बात करने वाला निगम ओवर ब्रिज के ऊपर अपना नाम भी अंकित करता है। ओवर ब्रिज के ऊपर रेलिंगो की रंगाई पुताई भी करवाता है। सिर्फ मरम्मत के वक्त ही यह लोक सेतु निर्माण के अंतर्गत आता है।

विज्ञापनों का कूड़ादान

ओवर ब्रिज की दीवारों पर लगे विज्ञापन

करोड़ों रुपए की लागत से बने इस ओवर ब्रिज की सुंदरता की बात की जाए तो वह किसी से छुपी नहीं है। ब्रिज के नीचे का एरिया पार्किंग प्लॉट बन रखा है। पुल की दीवारों पर जहां रंग रोगन होना था। वहा पुल के दीवारें तरह तरह के विज्ञापनों से पटी हुई है। देखने में बड़ा ही अटपटा विचित्र सा लगता है। इसकी जगह पर छत्तीसगढ़ की कला और संस्कृति को प्रदर्शित करने वाले दृश्य-चित्र बनाए जा सकते थे। अगर वह भी नहीं तो जनता को जागरूक करने के लिए स्लोगन भी लिख दिए जाते, तो भी कोई बात होती है ! मगर यहां यह दीवारें विज्ञापनों का कूड़ादान हो रखी है। जिसे जो मन में आता है चिपका कर, पोत चला जाता है।

अब आप ऊपर दिए गए चित्रों को देखकर समझ ही गए होंगे कि इस पुल को लेकर और शहर की सुंदरता को लेकर हमारा निगम प्रशासन कितना जागरूक है? ऐसी बात नहीं है कि यह सब कुछ निगम के संज्ञान में नहीं है पुल बने दशक होने को आ रहा है। निगम के दरवाजे से कुछ ही दूरी पर इस पुल की शुरुआत होती है। तो ऐसा असंभव प्रतीत होता है  कि कभी किसी निगम आयुक्त उपायुक्त या फिर किसी कर्मचारी का ध्यान इस पर नहीं गया हो।

इन विज्ञापनों के संबंध में जब निगम के कुछ अधिकारियों से बात की गयी तो यह तो स्पष्ट हो गया कि  इस पूल की सुंदरता बढ़ाने वाले प्रतिष्ठान के प्रचारकों ने निगम से किसी भी प्रकार का संवाद नहीं किया है। साफ शब्दों में कहा जाए तो बिना किसी परमिशन या शुल्क पटाए अपनी मनमर्जी, जहां चाहे वहां विज्ञापन पोत दिए गए हैं। और अब तक निगम को इस बात से कोई आपत्ति भी नहीं थी अगर होती तो कोई कार्यवाही जरूर होती! यह बिना अनुमति अपना प्रचार प्रसार किस तरह से कर रहे हैं..? निगम क्यों मेहरबान हैं पता नहीं।

दो वक्त की रोटी दो वक्त की रोटी कमाने वालों को नीचे से हटाया जाता है.. मगर खड़ी रहती है कारें

अक्सर निगम के द्वारा 100 ₹200 रुपए कमा कर अपने घर चलाने वाले छोटे-छोटे दुकानदारों को निगम ओवर ब्रिज के नीचे से हटाता नजर आता है। तो वही उसी के ऊपर अपने प्रतिष्ठान का विज्ञापन कर मोटी रकम कमाने वाले निगम की पहुंच से बाहर है। पुल के नीचे पार्किंग स्पॉट बनना बड़ी आम बात है। आते-आते बड़ी बड़ी गाड़ियों को महीनो आप वहां खड़े देख सकते हैं। इस तरह की दोहरी नीति को देखते हुए हमेशा सोशल मीडिया में लोगों का गुस्सा देखने को मिलता है। हालांकि निगम अधिकारियों का कहना है कि वे इस विषय को गंभीरता से लेंगे और बिना अनुमति विज्ञापन लगाने वालों पर कार्रवाई करेंगे। इसके साथ ही इसकी सुंदरता के लिए इसका रंग रोगन भी किया जाएगा। मगर आश्वासन नेताओं और अधिकारियों का पुख्ता हथियार है, इसका सभी को ज्ञान है। यह आश्वासन धरातल पर कब उतरेगा फिलहाल उसकी तो कोई समय सीमा नहीं है। मगर अब देखना यह है कि निगम इन विज्ञापन छापने वालों पर मेहरबानी करता है या कार्रवाई।