अमेरिकी फेड की रेट पॉलिसी को लेकर अनिश्चितता, दिसंबर में जोरदार एफआईआई आउटफ्लो और रुपये के रिकॉर्ड लो पर पहुंचने से भारतीय बाज़ारों में डर और प्रॉफिट बुकिंग तेज हो गई है।
मुंबई। भारतीय शेयर बाजार में पिछले कुछ सत्रों से लगातार दबाव बना हुआ है। ग्लोबल संकेत कमजोर हैं, अमेरिकी फेड की अगली रेट मीटिंग को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है, विदेशी निवेशकों ने जोरदार बिकवाली शुरू कर दी है और रुपया रिकॉर्ड निचले स्तरों पर फिसल चुका है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर क्यों गिर रहा है बाजार, जबकि आर्थिक ग्रोथ के आंकड़े और कई कंपनियों के नतीजे अभी भी ठीक-ठाक दिख रहे हैं।
फेड की रेट मीटिंग से क्यों डरे हुए हैं मार्केट?
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की अगली रेट मीटिंग इस समय ग्लोबल मार्केट्स के लिए सबसे बड़ा इवेंट बनी हुई है, क्योंकि यहीं से यह संकेत मिलेगा कि आगे ब्याज दरें कितने समय तक ऊंची रह सकती हैं। अगर फेड यह मैसेज देता है कि महंगाई को काबू में रखने के लिए वह लंबी अवधि तक टाइट पॉलिसी ही बनाए रखेगा, तो उभरते बाजारों में इक्विटी जैसे जोखिम वाले एसेट से पैसा निकलकर अमेरिकी बॉन्ड और डॉलर जैसे सेफ एसेट में जा सकता है।
एनालिस्टों का मानना है कि फिलहाल किसी आक्रामक कटौती की उम्मीद कम है, बल्कि “हायर फॉर लॉन्गर” वाला रुख बरकरार रह सकता है, जो इक्विटी के लिए नेगेटिव सेंटिमेंट बनाता है। इसी आशंका के चलते विदेशी निवेशक पहले से पोजीशन हल्की कर रहे हैं ताकि किसी भी नेगेटिव सरप्राइज की स्थिति में उनका नुकसान सीमित रहे।
दिसंबर में एफआईआई की जोरदार बिकवाली
दिसंबर की शुरुआत विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए सेलिंग मोड के साथ हुई है और पहले ही हफ्ते में 12,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की नेट बिकवाली दर्ज की गई है। पूरे साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2025 में एफआईआई भारत में इक्विटी से महत्वपूर्ण शुद्ध निकासी कर चुके हैं, जिससे इंडेक्स पर लगातार दबाव बना है।
एफआईआई आउटफ्लो के पीछे दो मुख्य कारण बताए जा रहे हैं:
1.विकसित बाजारों में बॉन्ड यील्ड और ब्याज दरें फिलहाल ज्यादा आकर्षक दिख रही हैं, जहां रिस्क कम और रिटर्न अपेक्षाकृत निश्चित माने जाते हैं।
2.रुपये में कमजोरी की वजह से भारत में कमाया गया रिटर्न डॉलर में बदलने पर घट जाता है, इसलिए कई विदेशी फंड करेंसी रिस्क से बचने के लिए पोजीशन काट रहे हैं।
घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीद के बावजूद एफआईआई की भारी बिकवाली के चलते हर उछाल पर प्रॉफिट बुकिंग देखने को मिल रही है और इंडेक्स ऊपर के स्तरों पर टिक नहीं पा रहे।
रुपये की रिकॉर्ड कमजोरी: इक्विटी के लिए डबल झटका
रुपया हाल के दिनों में 90 रुपये प्रति डॉलर के आसपास फिसल कर रिकॉर्ड निचले स्तरों पर पहुंच गया है, जो करेंसी मार्केट में दबाव का साफ संकेत है। रुपये की गिरावट से इम्पोर्टेड क्रूड ऑयल, सोना और हाई-टेक उपकरण जैसे उत्पाद महंगे हो जाते हैं, जिससे कंपनियों की लागत बढ़ती है और उनकी मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
विदेशी निवेशकों के लिए स्थिति और मुश्किल हो जाती है, क्योंकि अगर रुपया आगे और गिरता है तो उन्हें शेयरों की गिरावट के साथ-साथ करेंसी लॉस भी झेलना पड़ता है। ऐसे माहौल में कई ग्लोबल फंड जोखिम घटाने के लिए उभरते बाजारों में होल्डिंग कम करना पसंद करते हैं, जिसका असर सीधे भारतीय इक्विटी पर दिखता है।
आम निवेशक के लिए तस्वीर क्या कहती है?
मजबूत GDP ग्रोथ और कई सेक्टर्स में ठीकठाक कॉरपोरेट रिजल्ट्स के बावजूद ग्लोबल पॉलिसी रिस्क, एफआईआई आउटफ्लो और कमजोर रुपया मिलकर सेंटीमेंट को नेगेटिव बना रहे हैं। रिटेल निवेशक वोलैटिलिटी के बीच यह समझ नहीं पा रहे कि यह गिरावट सिर्फ शॉर्ट-टर्म डर है या किसी बड़े फंडामेंटल रिस्क की शुरुआत, जिस वजह से कई लोग घबराकर निचले स्तरों पर भी बेच रहे हैं।
मार्केट पर नजर रखने वाले एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगले कुछ हफ्तों में फेड की मीटिंग, RBI की अगली पॉलिसी, महंगाई के ताजा आंकड़े और एफआईआई फ्लो के ट्रेंड यह तय करेंगे कि यह गिरावट सिर्फ सेहतमंद करेक्शन साबित होगी या फिर लंबी कंसॉलिडेशन की शुरुआत। फिलहाल इतना साफ है कि ग्लोबल फैक्टर्स और करेंसी मोर्चे पर राहत के बिना बाजार में टिकाऊ रैली की उम्मीद करना मुश्किल हो सकता है



