रायगढ़। राजनीति में जब किसी शहर का रसूख बढ़ता है, तो माना जाता है कि उस शहर की बुनियादी समस्याओं के दिन लद गए हैं। वर्तमान में रायगढ़ छत्तीसगढ़ की सत्ता का वह केंद्र है, जहां से प्रदेश का वित्त राजस्व और पर्यावरण मंत्रालय संचालित होता है। लेकिन, सत्ता के इस ‘वीआईपी’ दर्जे के बीच रायगढ़ की रेल सुविधाओं का जो हाल है, वह एक बड़ा राजनीतिक विरोधाभास पेश करता है।
हाल ही में, राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह ने रायगढ़ में पांच महत्वपूर्ण ट्रेनों के ठहराव की मांग की। रेलवे ने बिना किसी हिचकिचाहट के इस मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि..
“रायगढ़ में 78 ट्रेनें काफी हैं, लंबी दूरी के लिए बिलासपुर या झारसुगुड़ा जाइए।”
इस सीधे और रूखे जवाब के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा होता है: क्या रेलवे रायगढ़ की भौगोलिक और औद्योगिक महत्ता को नहीं समझता, या फिर उसे यह पता है कि यह मांग जिस राजनीतिक ‘वजन’ के साथ उठाई जानी चाहिए थी, वह नदारद है?
बिना संघर्ष के सत्ता का सुख और सांसद की ‘खामोश राजनीति’
रायगढ़ की जनता के बीच यह चर्चा आम है कि राज्यसभा सांसद की कुर्सी तक पहुंचने के बाद भी श्री सिंह का जमीनी राजनीतिक दखल शून्य के करीब है। राजनीति में ‘कंबल ओढ़कर घी पीने’ की जो पुरानी कहावत है, वह यहां सटीक बैठती है.. यानी बिना किसी राजनीतिक संघर्ष या शोर-शराबे के पद और सत्ता के सुख का उपभोग करना।
स्थिति की विडंबना देखिए कि 3 जिलों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोक सभा सांसद राधेश्याम राठीया और स्वयं राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह… इन दोनों महोदय के पास रायगढ़ में अपना एक आधिकारिक और स्थायी सरकारी ऑफिस तक नहीं है! जो जन-प्रतिनिधि अपने संसदीय क्षेत्र में अपना एक मजबूत ‘बेस’ नहीं बना पाया, उसकी लिखी हुई एक चिट्ठी को दिल्ली में बैठा रेल मंत्रालय कितनी गंभीरता से लेगा, यह रेलवे के जवाब से स्पष्ट हो जाता है।
‘शक्तिशाली’ मंत्री और छले जाते स्थानीय हित
इस पूरी तस्वीर का दूसरा और ज्यादा चुभने वाला पहलू प्रदेश के वित्त और पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी की मौजूदगी है। यह रायगढ़ का दुर्भाग्य ही है कि जब भी शहर के विकास, पर्यावरण प्रदूषण के कड़े फैसलों या बुनियादी सुविधाओं की बात आती है, तो यह ‘ताकतवर’ नेतृत्व अक्सर स्थानीय हितों के साथ खड़ा नजर नहीं आता।
एक तरफ राज्य सरकार के सबसे अहम विभागों का जिम्मा रायगढ़ के पास है, और दूसरी तरफ केंद्र का एक विभाग (रेलवे) रायगढ़ के यात्रियों को 100 किलोमीटर दूर जाकर ट्रेन पकड़ने की नसीहत दे रहा है।
फाइनली निष्कर्ष
रेल मंत्रालय का यह इनकार सिर्फ ट्रेनों के ठहराव का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह रायगढ़ के राजनीतिक नेतृत्व का ‘लिटमस टेस्ट’ है। यह साबित करता है कि सिर्फ पदों पर बैठ जाने या भारी-भरकम मंत्रालय ले लेने से दिल्ली के गलियारों में शहर का प्रभाव नहीं बढ़ता। जब तक जन-प्रतिनिधियों की राजनीति में जनता के प्रति असल जवाबदेही और अधिकारों के लिए लड़ने का माद्दा नहीं होगा, तब तक रेलवे जैसी संस्थाएं इसी तरह रायगढ़ को ‘झारसुगुड़ा’ का रास्ता दिखाती रहेंगी।



