रायगढ़। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखंड का एक छोटा सा गांव ‘पाकरगांव’ इन दिनों अपनी एक खास फसल को लेकर सुर्खियों में है। यहां के खेतों में उगे पारंपरिक ‘जवांफूल’ चावल की महक अब सीधे प्रदेश के मुखिया यानी मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के निवास तक पहुंच रही है। 175 से 180 रुपये प्रति किलो की दर से बिकने वाले इस प्रीमियम सुगंधित चावल की खेती यहां के किसान सामूहिक रूप से कर रहे हैं, जो पूरे क्षेत्र के लिए कृषि समृद्धि की एक नई तस्वीर पेश कर रहा है।
पाकरगांव में कृषक निर्भय राम नायक, सेवक राम नायक, बूंद राम नायक, प्रदीप नायक और गणेश राम नायक ने मिलकर खेती का एक शानदार मॉडल तैयार किया है। ये सभी किसान करीब 10 एकड़ जमीन पर सामूहिक रूप से पारंपरिक और सुगंधित ‘जवांफूल’ धान की खेती कर रहे हैं। वर्षों से इस प्रजाति को सहेज रहे इन किसानों का अनुभव है कि सामान्य धान की तुलना में यह पारंपरिक सुगंधित प्रजाति आर्थिक रूप से कहीं अधिक मुनाफा देती है। अपनी खास महक, बेहतरीन गुणवत्ता और लाजवाब स्वाद के कारण बाजार में इसकी डिमांड लगातार तेजी से बढ़ रही है।

इस स्पेशल चावल की मांग सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। पाकरगांव की मिट्टी में तैयार जवांफूल चावल रायगढ़ से निकलकर राजधानी रायपुर और देश की राजधानी दिल्ली तक के बाजारों में अपनी जगह बना चुका है। किसानों के लिए सबसे बड़े गर्व का विषय यह है कि उनके खेतों में पूरी शुद्धता के साथ तैयार यह चावल प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के निवास पर भी भेजा जाता है। अपनी प्रीमियम क्वालिटी के चलते बाजार में उपभोक्ता सीधे किसानों से 175 से 180 रुपये प्रति किलो की दर से इसे हाथों-हाथ खरीद रहे हैं। कम लागत और बेहतर गुणवत्ता ने किसानों के भरोसे को और भी मजबूत कर दिया है।
जवांफूल की खेती सामान्य धान से थोड़ी अलग होती है, जिसमें विशेष देखभाल और प्रबंधन की जरूरत पड़ती है। किसानों के मुताबिक, शुद्ध बीज के चयन से लेकर समय पर कृषि कार्य करना बेहद अहम है। इस धान से प्रति एकड़ लगभग 12 से 15 क्विंटल का उत्पादन मिलता है और मिलिंग के बाद करीब 60 प्रतिशत तक शुद्ध चावल प्राप्त होता है। लैलूंगा क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी इस सुगंधित धान के लिए पूरी तरह अनुकूल है।
फसल की गुणवत्ता को उत्कृष्ट बनाए रखने के लिए किसान रासायनिक खादों पर निर्भर रहने के बजाय प्राकृतिक तरीकों पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। इस खरीफ सीजन में धान रोपने से पहले किसानों ने खेतों में ‘ढैंचा’ (हरी खाद) का उपयोग कर भूमि की उर्वरता बढ़ाने का काम किया है। ढैंचा को खेत की मिट्टी में मिलाने से जैविक तत्वों की वृद्धि होती है और फसल को प्राकृतिक पोषण मिलता है। कृषि विभाग और ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों द्वारा ढैंचा का बीज उपलब्ध कराकर किसानों को उन्नत तकनीक और स्थानीय फसलों के संरक्षण के लिए लगातार मार्गदर्शन दिया जा रहा है। पाकरगांव के इन किसानों की यह पहल प्राकृतिक खेती और गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पादन का एक बेहतरीन उदाहरण बन गई है।



