रायगढ़ (RIG24)। “ये नया हिंदुस्तान है…” फिल्म का यह चर्चित डायलॉग इन दिनों रायगढ़ जिले में सत्ताधारी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर बिल्कुल सटीक बैठ रहा है। ‘ट्रिपल इंजन’ की सरकार और ‘साएं-साएं’ वाले सुशासन के दावों के बीच, जिले में पार्टी संगठन तेजी से एक ‘नई भाजपा’ गढ़ने में लगा हुआ है। राजनीति के इस नए दौर में बदलाव और ताकत का इस्तेमाल कर चेहरे और मोहरे बदले जा रहे हैं, जहां दल-बदल कर आए (आयातित) नेताओं का कद बढ़ रहा है और दशकों तक संघर्ष करने वाले दिग्गज नेपथ्य में धकेले जा रहे हैं।
मंच की तस्वीरों ने बयां की अंदरूनी राजनीति
भूपेश सरकार को पटखनी देकर लौटी भाजपा ने अपना आधा कार्यकाल पूरा कर लिया है। निगम-मंडलों में कुर्सियां भले ही अभी पूरी तरह नहीं भरी जा सकी हैं और निकायों में एल्डरमैन के पद खाली पड़े हों, लेकिन पार्टी के कार्यक्रमों में ‘पावर डायनामिक्स’ (सत्ता समीकरण) पूरी तरह बदल चुके हैं।
इन दिनों पार्टी पीएम मोदी के 12 साल के बेमिसाल कार्यकाल का जश्न मना रही है, तो वहीं राज्य सरकार सिस्टम के जरिए ‘सुशासन तिहार’ मना रही है। इन बड़े कार्यक्रमों और बैनर-पोस्टरों की तस्वीरें एक नई राजनीतिक कहानी कह रही हैं। हाल ही के आयोजनों में यह साफ देखा गया कि पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व विधायक विजय अग्रवाल जैसे दिग्गज चौथी पंक्ति में बैठे नजर आए। वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस से भाजपा में आए और कुछ ही सालों से भगवा लहराने वाले ‘आयातित नेता’ पहली और दूसरी, पंक्ति में मंच की शोभा बढ़ाते दिखे।

राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि इसे नई भाजपा का उदय कहें या फिर पुराने और बड़े नेताओं को अघोषित रूप से ‘मार्गदर्शक मंडल’ में बैठाने का रिवाज?
क्या हो रहा है विजय-रोशन गुट का अंत?
90 के दशक के बाद रायगढ़ में जनसंघ और फिर भाजपा की जड़ें मजबूत करने में स्व. रोशन अग्रवाल और विजय अग्रवाल की राजनीतिक जुगलबंदी और संघर्ष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विपक्ष में रहते हुए जिस जोड़ी ने जिले में भगवा परचम लहराया था, आज सत्ता के दौर में वही पुराने गुट और उसके समर्थक हाशिए पर जाते दिख रहे हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि ‘गुजरात फॉर्मूले’ की तर्ज पर रायगढ़ में संगठन को पूरी तरह से रीबूट (Reboot) किया जा रहा है। पार्टी अब पुराने दिग्गजों की जगह नए चेहरों और आयातित मोहरों पर बड़ा दांव लगा रही है। साय कैबिनेट में भविष्य में क्या बदलाव होंगे, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन जिले में भाजपा ने 2028 के विधानसभा चुनावों के लिए अपनी ‘नई टीम’ और कैंपेनिंग की रूपरेखा अभी से सेट करनी शुरू कर दी है।
बदलाव के इस दौर में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आयातित नेताओं के सहारे तैयार हो रही इस ‘नई भाजपा’ को पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं का कितना जमीनी साथ मिल पाता है।



