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आखिर क्यों चला धनागार में आदिवासियों पर बुलडोजर: मामले का दूसरा पहलू भी.. पढ़िए इनसाइड स्टोरी.. पूरे दस्तवजों के साथ

रायगढ़। रायगढ़ से सटे धनागर में बीते मंगलवार को करीब आधा दर्जन आदिवासियों का घर बुलडोजर से ढा दिया गया था। इस मामले ने काफी तूल पकड़ा है। जैसे हर सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे भी इस मामले का दूसरा पहलू भी सामने आया है। दरअसल इस मामले में पिछले तीन सालों में न्यायालय के द्वारा इन आदिवासियों को बेदखली का आदेश जारी किया गया था। न्यायालय के आदेश के बाद, प्रशासनिक अमले की उपस्थिति में कब्जे की जमीन तो छोड़ दी, मगर मकान खाली करने के लिए कुछ दिन का समय मांगा गया। मगर सालों बीतने के बाद भी वे अपना बेजा कब्जा हटाने को तैयार नहीं थे। इस मामले का पूरा कानूनी पहलू स्टेप बाय स्टेप दस्तावेजों के साथ समझते है। 

दरअसल विवादित जमीन का पिछले तीन-चार सालों से राजस्व न्यायालय में केस चल रहा है। धनागर और बघनपुर आपस से सटे हुए हैं। इसी क्षेत्र में  कुछ आदिवासियों की और गोपाल अग्रवाल और निखिल अग्रवाल की भी निजी जमीन है। विवादित जमीन पर मालिकाना हक का दावा करने वाले गोपाल अग्रवाल और निखिल अग्रवाल के द्वारा 2023 नायब तहसीलदार के कोर्ट में इन आदिवासियों पर जबरन उनकी जमीन पर मकान बनाने और कब्जा करने को लेकर परिवाद दायर किया गया था। कोर्ट के आदेश से पटवारी से सीमांकन करने के बाद पाया गया कि गोपाल और निखिल अग्रवाल की जमीन पर इन आदिवासियों की मकान और बाड़ी बनी हुई है। इसके बाद सितंबर 2023 में इन आदिवासियों को जमीन से हटाने के लिए आदेश जारी किया गया था।

न्यायालय के आदेश के बाद 12 मार्च 2024 प्रशासनिक अमला बेदखली के लिए गए। जहां दोनों पक्ष मौजूद थे। मकान को छोड़कर बाकी कब्जे के हिस्से को बेदखली करवा दिया गया और मकान के लिए कुछ महीनो का समय मांगा गया था। इस पर पंचनामा की कार्रवाई भी हुई थी।

6 महीने से अधिक का समय बीतने पर भी, जब मकान खाली नहीं किया गया। तब एक बार फिर से न्यायालय में इनकी शिकायत की गई और फिर से यह केस शुरू हुआ।

इसके बाद न्यायालय द्वारा फिर से इन आदिवासियों को जमीन खाली करने के लिए आदेश जारी हुआ। जिसके लिए उन्होंने एक हफ्ते का मौखिक समय मांगा था।

बेदखली फैसले के विरुद्ध बाद एसडीएम न्यायालय में आदेश को स्थगित करने के लिए अपील दायर की गई। जिसमें सुनवाई के एसडीएम द्वारा उनकी अपील को खारिज कर दिया गया।

इसके बाद जब बेदखली के लिए न्यायालय द्वारा फिर से नोटिस जारी हुआ। तो इन्होंने नोटिस लेने से इनकार कर दिया। जिसका 26 में को सुनवाई के दौरान जिक्र भी है।

तो यह रही इस मामले की दूसरी सच्चाई। न्यायालय के आदेश बाद विधिवत रूप से जब प्रकाशनिक अमला अवैध कब्जे को हटाने गया। तब इन आदिवासियों ने कब्जे की कुछ भूमि तो छोड़ दी, मगर मकान के लिए मोहलत मांगा और समय खत्म पर वे कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं थे। जैसे बेदखली के लिए अपनाया गये बुलडोजर सिस्टम को सही नहीं ठहराया जा सकता, मगर इस मामले में यह जरूर कहा जा सकता है कि अवैध कब्जा करने वाले भी दूध के धुले नही हैं।

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