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5-स्टार में ‘मौत से सीखने’ की ट्रेनिंग और पटरियों पर कट रहे हाथी: प्रदूषण और लापरवाही से 6 महीने में 9 शावकों समेत 10 मौतें, सिस्टम बेनकाब

रायगढ़। छत्तीसगढ़ के वन महकमे की फाइलें इन दिनों बड़ी ‘हाई-टेक’ और उपलब्धियों से भरी नजर आ रही हैं। 5-सितारा होटलों में अफसरों की महंगी ट्रेनिंग चल रही है, ड्रोन कैमरों से जंगलों की निगरानी के दावे हो रहे हैं और ‘मानव-हाथी सह-अस्तित्व’ पर सेमिनार पढ़े जा रहे हैं। लेकिन इन वातानुकूलित (AC) कमरों से बाहर निकलकर रायगढ़ के जंगलों की जमीनी हकीकत देखी जाए, तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे। रायगढ़ के जंगल और रेलवे ट्रैक अब हाथियों के लिए ‘संरक्षित क्षेत्र’ नहीं, बल्कि एक खौफनाक ‘डेथ जोन’ बन चुके हैं।

बीती रात मारे गए हाथी का शव, एक्सीडेंट के वक्त उसकी आंखों में दर्द साफ दिख रहा था, 12 घंटे तक भयानक दर्द के साथ आज सुबह 9:00 बजे उसकी मौत हो गई

RIG24 की इस एक्सक्लूसिव पड़ताल में जो आंकड़े और तथ्य सामने आए हैं, वे न सिर्फ सिस्टम की नाकामी की पोल खोलते हैं, बल्कि एक ‘साइलेंट किलिंग’ की तरफ भी इशारा करते हैं।

एक पूरी पीढ़ी का खात्मा: 6 महीने में 9 शावकों की मौत

जनवरी 2026 से लेकर मध्य जून तक, महज 6 महीनों के भीतर रायगढ़ वन मंडल में कुल 10 हाथियों की जान जा चुकी है। इसमें सबसे ज्यादा डराने वाला और अलार्मिंग सच यह है कि इन 10 मौतों में से 9 मौतें सिर्फ ‘हाथी शावकों’ (बच्चों) की हैं। किसी भी हाथियों के दल में शावक सबसे अहम और नाजुक कड़ी होते हैं। अगर सिर्फ 6 महीने में 9 बच्चे दम तोड़ दें, तो यह सामान्य मौतें नहीं, बल्कि हाथियों की एक पूरी ‘भावी पीढ़ी’ के खात्मे का संकेत है।

मौतों का असली सच: औद्योगिक प्रदूषण से हो रही ‘साइलेंट किलिंग’

वन विभाग शावकों की मौत का कारण दलदल में फंसना या बीमारियां बताकर पल्ला झाड़ रहा है, लेकिन हमारी पड़ताल में इसका एक बड़ा और खौफनाक ‘मिसिंग लिंक’ सामने आया है। देहरादून और बरेली की लैब रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि कई शावकों की मौत निमोनिया, हेपेटाइटिस (लिवर इन्फेक्शन) और सेप्टिसीमिया (रक्त संक्रमण) से हुई है।

आखिर जंगलों में पलने वाले वन्यजीवों को ये गंभीर बीमारियां क्यों हो रही हैं? देखा जाए तो इसका सीधा जवाब रायगढ़ के औद्योगिक प्रदूषण में छिपा है। कोल माइंस, स्पंज आयरन और पावर प्लांट्स से उड़ने वाली कोल डस्ट और ‘फ्लाई ऐश’ (Fly Ash) सीधे जंगलों के पत्तों पर जम रही है। फैक्ट्रियों का केमिकल वाला जहरीला पानी जंगलों के नदी-नालों और तालाबों में मिल रहा है। जब कमजोर इम्युनिटी वाले छोटे हाथी के बच्चे इन जहरीले पत्तों को खाते हैं और दूषित पानी पीते हैं, तो उनका लिवर डैमेज होना (हेपेटाइटिस) और खून में संक्रमण होना तय है। यह मौतें कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि औद्योगिक प्रदूषण से हो रही ‘साइलेंट किलिंग’ है।

ड्रोन वाला ‘दोहरा चरित्र’ और 5-स्टार होटल की ट्रेनिंग

वन विभाग की कार्यप्रणाली के विरोधाभास (Contradiction) को देखिए। 28 मई को छाल परिक्षेत्र में 52 हाथियों के दल के पास जाकर रील (वीडियो) बनाने वाले युवकों को ट्रैक करने के लिए विभाग के ‘ड्रोन कैमरे’ मुस्तैद रहते हैं और उन पर तुरंत एफआईआर दर्ज होती है।

विभाग द्वारा जारी किए ड्रोन कैमरे से तस्वीर और वे अज्ञात लोग पर एफआईआर दर्ज किया गया

इसके बाद 5 और 6 जून को रायगढ़ के प्रतिष्ठित होटल ट्रिनिटी ग्रैंड (Hotel Trinity Grand) में देश भर के दिग्गजों की मौजूदगी में “लर्निंग फ्रॉम डेड” (मौत से सीखना) विषय पर एक भव्य राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित होती है। लेकिन विडंबना देखिए कि इस ‘हाई-प्रोफाइल’ ट्रेनिंग के ठीक 10 दिन बाद (15-16 जून की रात) घरघोड़ा में रेलवे ट्रैक पार कर रहा 6 से 10 हाथियों का दल मालगाड़ी के सामने आ जाता है और एक 40 वर्षीय मादा हाथी कटकर तड़प-तड़प कर जान दे देती है।

शहर के पांच सितारा होटल में आयोजित हाथियों के लिए आयोजित सेमिनार

सवाल यह है कि जब हाथियों का दल रेलवे ट्रैक की तरफ बढ़ रहा था, तब विभाग का वो एडवांस ‘ड्रोन’ और ‘हाथी मित्र दल’ कहाँ था? रेलवे के लोको पायलट को एडवांस में अलर्ट क्यों नहीं भेजा गया? साफ है कि तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ प्रेस रिलीज और अपनी पीठ थपथपाने के लिए हो रहा है, हाथियों की जान बचाने के लिए नहीं।

बीती रात माल गाड़ी के चपेट में आया हाथी

240 से 450 हुए हाथी, लेकिन कॉरिडोर बन गया ‘डेथ जोन’

वन मंत्री शान से बताते हैं कि हाथियों की संख्या 2022 में 240 थी जो अब बढ़कर 450 हो गई है। लेकिन जब हाथियों की आबादी दोगुनी हो रही है, तो उनके रहने के जंगल (कॉरिडोर) माइनिंग और उद्योगों के कारण सिकुड़ रहे हैं। बचे हुए जंगल जहरीले हो चुके हैं।

अगर वन विभाग, रेलवे और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PCB) ने मिलकर कोई ठोस जमीनी रणनीति नहीं बनाई, तो होटलों में होने वाली करोड़ों की ट्रेनिंग और कागजी योजनाएं धरी की धरी रह जाएंगी, और पटरियों व जहरीले तालाबों में इन बेजुबानों की मौत का खौफनाक सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। आज एक हाथी ट्रेन से कटा है, कल अपने बच्चों और साथियों की मौत से बौखलाया दल अगर किसी बस्ती में घुसकर कहर बरपाएगा, तो इस महाविनाश का जिम्मेदार कौन होगा?

– आशीष शर्मा, संपादक, आर आई जी 24

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