रायगढ़। (RIG24 इन्वेस्टिगेशन डेस्क): रायगढ़ शहर से लगे गोपालपुर और विजयपुर क्षेत्र में सरकारी जमीनों के सीमांकन और विभागीय स्वामित्व को लेकर एक ऐसा हैरतअंगेज मामला सामने आया है, जो सीधे तौर पर भू-माफिया और प्रशासनिक ढुलमुलपन के गठजोड़ की ओर इशारा करता है। एक ही खसरा नंबर और भूखंड पर वन विभाग और राजस्व विभाग द्वारा समानांतर (Parallel) कानूनी कार्रवाइयां की जा रही हैं, जिसने न केवल स्थानीय पीड़ितों को विधिक संकट में डाल दिया है, बल्कि सरकारी दावों की पोल भी खोल दी है।

क्षेत्र के प्रतिष्ठित समाचार पत्र की हालिया रिपोर्ट और पीड़ितों द्वारा जिला कलेक्ट्रेट में सौंपे गए आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, इस पूरे विवाद के पीछे एक रसूखदार कॉलोनाइजर का ‘अदृश्य हाथ’ होने की आशंका गहरा गई है, जो सरकारी सरहदों को लांघकर एक बड़ी निजी कॉलोनी का निर्माण कर रहा है।
25 साल पुरानी वन भूमि, अचानक कैसे बनी राजस्व की जमीन?
दस्तावेजों के मुताबिक, साल 2001 में वन मण्डलाधिकारी (DFO) रायगढ़ द्वारा भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 80-A के तहत गोपालपुर-विजयपुर के कंपार्टमेंट नंबर 965 और 964 की भूमि को “वन भूमि” (Forest Land) बताते हुए बेदखली का आदेश जारी किया गया था। पीड़ितों का कहना है कि पिछले 22 वर्षों से इस जमीन पर वन विभाग द्वारा भारी मात्रा में प्लांटेशन (वृक्षारोपण) किया गया है, जिसके पेड़ आज भी वहां मौजूद हैं।

लेकिन खेल तब शुरू हुआ जब मई 2026 में अचानक राजस्व विभाग (तहसीलदार न्यायालय रायगढ़) द्वारा इसी भूमि/खसरा नंबर के संबंध में कब्जा हटाने का एक नया नोटिस (क्रमांक 230) जारी कर दिया गया। सवाल यह उठता है कि जो जमीन पिछले ढाई दशक से वन विभाग के रिकॉर्ड और प्लांटेशन के तहत संरक्षित थी, वह अचानक राजस्व विभाग की फाइलों में ‘अनाधिकृत कब्जा’ कैसे बन गई?

पर्दे के पीछे का खेल: कॉलोनाइजर की बाउंड्री में समा गया सरकारी ‘मुनारा’
स्थानीय सूत्रों और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे जमीनी वीडियो के अनुसार, इस पूरे विवादित भूखंड से सटी हुई एक विशाल निजी कॉलोनी का निर्माण युद्ध स्तर पर चल रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि वन विभाग की सुरक्षा के लिए बनाई गई ‘सीपीटी’ (Cattle Proof Trench) और विभागीय ‘मुनारा’ (Boundary Pillar) अब उस प्राइवेट कॉलोनाइजर की बाउंड्री वॉल के भीतर समा चुके हैं। आरोप है कि इसी रसूखदार कॉलोनाइजर को एप्रोच रोड या अतिरिक्त फायदा पहुंचाने के लिए राजस्व विभाग के कुछ मोहरों का इस्तेमाल कर गरीब काश्तकारों को बेदखली का नोटिस थमाया गया है, ताकि वे डरकर पीछे हट जाएं।

जिम्मेदारों के बयानों में विरोधाभास: जब रेंजर और तहसीलदार ही आमने-सामने!
इस पूरे नेक्सस का सबसे दिलचस्प पहलू दोनों विभागों के प्रभारियों के ऑन-रिकॉर्ड बयानों में छिपा है। मामले को लेकर जब तकनीकी पक्ष खंगाला गया, तो सिस्टम का अंतर्विरोध खुलकर सामने आ गया:
- रायगढ़ रेंजर संजय लकड़ा का कहना है कि उक्त कंपार्टमेंट में पूर्व में पीओआर (POR) दर्ज हुआ है और वनभूमि पर अतिक्रमण को लेकर विभाग सजग है। वह इस बात को स्वीकार करते हैं कि वहां वन विभाग का प्लांटेशन मौजूद है।
- दूसरी तरफ, तहसीलदार शिव डनसेना रायगढ़ का बयान है कि पटवारी प्रतिवेदन के आधार पर नोटिस जारी कर 19 मई को पेश होने का समय दिया गया था। जब उनसे वन विभाग के दावों और मुनारे को लेकर पूछा गया, तो उनका कहना था, “अगर ऐसी कोई बात है तो मैं पता करता हूँ।”
सवाल: आख़िर संयुक्त सीमांकन से क्यों भाग रहा है प्रशासन?
यह पूरा मामला पूर्व में विधानसभा तक में गूंज चुका है, जहां सदन में जवाब देने के बाद भी आज तक कोई ठोस धरातलीय कार्रवाई नहीं की गई। भू-राजस्व संहिता और वन नियमों के आलोक में सीधा नियम यह है कि जब भी दो विभागों के बीच ‘Jurisdiction’ (क्षेत्राधिकार) का टकराव हो, तो सबसे पहले दोनों विभागों के भू-अभिलेखों (नक्शा, खसरा, वन अधिसूचना) का संयुक्त मिलान (Joint Demarcation) कराया जाना चाहिए।
सवाल यह है कि बिना रिकॉर्ड का मिलान किए, और कॉलोनाइजर द्वारा डकारे गए सरकारी मुनारे पर चुप्पी साधे रखकर, केवल पीड़ितों पर एकतरफा बेदखली की तलवार क्यों लटकाई जा रही है? जब तक जिला कलेक्टर महोदय के निर्देशन में दोनों विभागों के स्वामित्व का अंतिम निर्धारण नहीं हो जाता, तब तक इस एकतरफा नोटिस की वैधानिकता खुद-ब-खुद संदेह के घेरे में रहेगी।



