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महज 6 साल के मासूमों को मिली ‘तालिबानी’ सजा: बाउंड्री पर चढ़ने पर 200 उठक-बैठक और रुकने पर थप्पड़ ही थप्पड़! कोतवाली पुलिस ने मासूमों को छोड़ आरोपी से दिखाई दरियादिली

रायगढ़। शहर के कोतवाली थाना क्षेत्र से मासूम बच्चों के साथ क्रूरता का एक ऐसा दहला देने वाला मामला सामने आया है, जिसने इंसानियत को भी झकझोर दिया है। खेल-खेल में बाउंड्री वॉल पर चढ़ने जैसी मामूली बात पर एक पड़ोसी ने मासूम 6 साल के बच्चों को 200 से ज्यादा बार उठक-बैठक करने का तालिबानी सजा दे डाली । इतना ही नहीं, जब बच्चे थक कर रुक जाते, तो उन्हें बेरहमी से थप्पड़ से पीटा जाता रहा।

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात कोतवाली पुलिस का रवैया है। पुलिस ने इस अमानवीय और संवेदनशील मामले में कोई संवेदना नहीं दिखाई। मासूमों से ‘तालिबानी’ क्रूरता के इस मामले को दो वयस्कों के बीच की सामान्य मारपीट मानकर हल्की धाराओं ( BNS की धारा 296, 115 (2)) में अपराध दर्ज किया गया और दरियादिली दिखाते हुए आरोपी को थाने से ही चलता कर दिया गया।”

दीवार फांदने पर मिली ‘तालिबानी’ प्रताड़ना

जानकारी के मुताबिक, यह घटना 4 जुलाई की शाम करीब 5 बजे की है। जगतपुर, लक्ष्मी हाइट्स के सामने रहने वाली पीड़ित बच्ची की मां एक फर्नीचर शोरूम में काम करती हैं।

उन्होंने ने पुलिस को बताया कि

“4 जुलाई की शाम करीब 6:40 बजे मुझे मेरी मां ने फोन पर बताया कि मेरी 6 साल की बेटी  के साथ मारपीट की गई है। जब मैं घर पहुंची, तो देखा कि मेरी बेटी ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। मेरी मां ने बताया कि शाम 5 बजे सृष्टि मोहल्ले के कुशाल डहरे, खिलेश डहरे और मानस नंदे के साथ खेल रही थी। खेलने के दौरान बच्चे पड़ोसी धीरेंद्र मिश्रा के घर की बाउंड्री वॉल पर चढ़ गए थे। इसी बात पर धीरेंद्र मिश्रा घर से बाहर निकले और ‘दीवार पर क्यों चढ़े हो’ कहकर उसकी बेटी सहित मोहल्ले के दो और बच्चों  को अपने घर के अंदर ले गए। वहां उन्होंने बच्चों को दंड स्वरूप 200-200 बार उठक-बैठक करने का तालिबानी फरमान सुनाया। बच्चे बीच में रुकते, तो उन्हें फिर से 200 बार उठक-बैठक करने के लिए मजबूर किया जाता। जब सृष्टि और कुशाल उठक-बैठक नहीं कर पाए, तो आरोपी ने उन्हें गालियां देते हुए जोरदार थप्पड़ जड़े।”

थाने में हुआ खेल: बच्चे गए मेडिकल, आरोपी को मिली ‘राहत’

​इस क्रूरता के बाद जब रात को पीड़ित बच्चों को मुलाहिजा (मेडिकल परीक्षण) के लिए अस्पताल भेजा गया, ठीक उसी दौरान कोतवाली पुलिस ने आरोपी धीरेंद्र मिश्रा को थाने से ही छोड़ दिया।

कानून के जानकारों के मुताबिक, आरोपी के खिलाफ पुलिस ने जो धाराएं लगाई हैं, वे अमूमन दो वयस्क (Adult) लोगों के बीच होने वाली सामान्य मारपीट और गाली-गलौज की हैं, जो जमानती होती हैं। जबकि बच्चों के साथ जो अमानवीय क्रूरता हुई है, वह सीधे तौर पर किशोर न्याय अधिनियम, 2015 (Juvenile Justice Act) के तहत आती है। यह 6 साल की मासूम बच्ची और अन्य छोटे बच्चों के खिलाफ ‘क्रूरता’ का स्पष्ट मामला है।

कानून के जानकारों का यह भी तर्क है कि बच्चों को उनकी मर्जी के खिलाफ रोककर बलपूर्वक दंडित करना ‘सदोष अवरोध’ (Wrongful Confinement) और ‘आपराधिक धमकी’ की श्रेणी में आता है। लेकिन पुलिस ने इस पूरे मामले की ड्राफ्टिंग इतनी कमजोर की, जैसे मोहल्ले में कोई बहुत सामान्य सी घटना हुई हो।

लेकिन पुलिस ने इन कड़े कानूनों की जानबूझकर अनदेखी की और सिर्फ हल्की, जमानती धाराएं लगाकर मामले को रफा-दफा कर दिया।

क्या चूक गई पुलिस या बात कुछ और..?

पीड़ित परिवार आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आता है। जिले की कमान आईजी (IG) रैंक के अधिकारी और वर्तमान रायगढ़ एसपी शशि मोहन सिंह का स्पष्ट संदेश है कि महिला और बच्चों के साथ हुए अपराध पर किसी प्रकार की कोताही नहीं बरती जाएगी। काफी मामलों में यह सच भी है। ऐसे में कोतवाली पुलिस द्वारा इतने संवेदनशील मामले को जिस तरह से ‘हैंडल’ किया गया है, वह पूरी तरह से समझ से परे है। जरा सोचिए, सिर्फ बाउंड्री वॉल पर चढ़ने की सजा 200 बार उठक-बैठक! अगर यह सजा किसी हट्टे-कट्टे वयस्क को भी दे दी जाए, तो उसकी भी हालत खराब हो जाए। फिर इन मासूमों का क्या कसूर था? पुलिस का यह रवैया सिस्टम से एक ही सवाल पूछता है.. क्या न्याय सिर्फ उनके लिए है, जिनका रसूख थाने के भीतर तक बोलता है?

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