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रायगढ़ की नदियों में ‘फ्लाई ऐश’ का त्रिवेणी संगम: NGT को चिता की राख से ऐतराज, पर हजारो टनों औद्योगिक राख ‘केलों’ मे मिलने पर सिस्टम मौन..?

रायगढ़। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) नदियों और जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने के लिए चिता की राख तक विसर्जित करने पर एतराज जताता है। लेकिन, रायगढ़ के औद्योगिक इलाकों में इसी NGT के नियमों की चिता रोज जलाई जा रही है। हर साल हज़ारों टन फ्लाई ऐश नदी नालों मे शातिराने तरीके से बहा दिया जाता है और उसी पानी को हम और आप पीते है।

अगर आपको इस खुले खेल का ‘आंखों देखा सबूत’ चाहिए, तो नीचे वीडियो को देखिए। यह बरपाली ग्राम के प्राकृतिक ‘बरदे नाले’ का वीडियो है। इसमें आप साफ देख सकते हैं कि नाले के दोनों किनारों को फ्लाई ऐश (औद्योगिक राख) से पाट दिया गया है। पानी की प्राकृतिक धार के साथ राख का यह ‘धीमा जहर’ घुलकर सीधे रायगढ़ की जीवनदायिनी ‘केलो नदी’ की ओर बह रहा है। यह नजारा किसी त्रिवेणी संगम जैसा लगता है, लेकिन यह आस्था का नहीं, औद्योगिक स्वार्थ का संगम है।

राख माफिया का नेक्सस: इस बार रूपानाधाम और नवदुर्गा प्लांट पर आरोप

जलस्रोतों को खुलेआम तबाह करने का यह दुस्साहस बता रहा है कि उद्योग और ट्रांसपोर्टर्स के हौसले कितने बुलंद हैं। स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि नाले में डंप किया गया यह फ्लाई ऐश ‘रूपानाधाम’ और ‘नवदुर्गा’ प्लांट का है। बताया जा रहा है कि इस राख को बेखौफ तरीके से जलस्रोतों में पाटने का ठेका ट्रांसपोर्टर रोहतास नेहरा की फर्म के पास है। जिसने इसे करीब 2 महीने पहले ही डम्प किया है।

​8 महीने पुरानी लीपापोती को बरसात ने किया बेनकाब

वीडियो में बहती हुई राख यूं ही नहीं दिख रही है; इसके पीछे प्रशासनिक लीपापोती की एक दिलचस्प कहानी है। करीब 8 महीने पहले जब इस नाले में राख डंपिंग की शिकायत हुई थी, तब वन विभाग और पर्यावरण विभाग के अधिकारियों ने मौके पर आकर एक बड़ा ‘एहसान’ किया था। उन्होंने ठोस समाधान के बजाय, उसके ऊपर सिर्फ मिट्टी का छिड़काव करवा कर मामले को दफन कर दिया और रायगढ़ इस्पात और रुपाणा धाम प्लांट पर मामूली जुर्माना के साथ केस क्लोज कर दिया था ।

दोबारा से पानी के साथ मिलने फ्लाई ऐश

​लेकिन कुदरत को धोखा नहीं दिया जा सकता। इस बार की बरसात ने उस मिट्टी को धो डाला और अधिकारियों के ‘किए-धरे’ पर पानी फेरते हुए राख के इस पहाड़ को फिर से बेनकाब कर दिया, जो अब पानी की धार के साथ बहता नजर आ रहा है।

राख की जद में रायगढ़: घर से लेकर पानी तक सब काला

​यह सिर्फ एक नाले की त्रासदी नहीं है। गेरवानी, सरायपाली और घरघोड़ा रोड पर दर्जनों छोटे-बड़े उद्योग स्थापित हैं। इन उद्योगों से निकलने वाले फ्लाई ऐश का परिवहन इस क्षेत्र का सबसे बड़ा और मुनाफे वाला व्यापार बन चुका है। हालात इतने भयावह हैं कि प्राकृतिक नालों, तालाबों, घरों के आंगनों और यहां तक कि लोगों के सूखते कपड़ों पर भी राख की परत जमी रहती है। ग्रामीण शिकायतें करते हैं, लेकिन कार्रवाई तभी होती है जब मामला मीडिया में उछलता है।

क्या अब जागेगा पर्यावरण विभाग..?

बरदे नाले से बहकर केलो नदी में मिलता यह राखड़ सिर्फ प्रदूषण नहीं, बल्कि रायगढ़ के भविष्य के खिलाफ एक खुला अपराध है। वीडियो के रूप में पुख्ता सबूत सामने आने के बाद, अब गेंद रायगढ़ जिला प्रशासन और पर्यावरण संरक्षण मंडल के पाले में है। उन्हें जानकारी भी दे दी गई है।

​देखना यह है कि क्या इस बार प्लांट प्रबंधन और ट्रांसपोर्टर के खिलाफ कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई होगी, या फिर से नाले में मिट्टी डालकर इस पूरे मामले की लीपापोती कर दी जाएगी? क्या कागजों पर पर्यावरण बचाने वाला विभाग असलियत में राख माफिया के ‘नजराने’ के आगे नतमस्तक ही रहेगा?

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