रायगढ़। (RIG24 इन्वेस्टिगेशन डेस्क): औद्योगीकरण और खदानों के लिए जमीन अधिग्रहण रायगढ़ जिले के लिए कोई नया शब्द नहीं है। लेकिन, 19 मई को गारे पेल्मा (Gare Pelma) कोल ब्लॉक को लेकर होने जा रही ‘जनसुनवाई’ से ठीक पहले, अधिग्रहण के कुछ ऐसे कानूनी पेंच (Legal Loopholes) सामने आए हैं, जिनसे रायगढ़ के ग्रामीणों और किसानों को अनजान रखा गया है।
जब भी कोई बड़ा प्रोजेक्ट आता है, तो ‘4 गुना मुआवजे’ और ‘रोजगार’ का नैरेटिव सेट कर दिया जाता है। लेकिन हकीकत में, जमीन अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया कुछ ऐसे कानूनों (जैसे- CBA Act, लीनियर प्रोजेक्ट और MDO मॉडल) के तहत गुजर रही है, जिसमें ग्राम सभा की शक्तियां और किसानों के अधिकार बेहद सीमित हो जाते हैं।
RIG24 ने इस पूरे अधिग्रहण मॉडल और 19 मई की प्रस्तावित जनसुनवाई की विधिक पड़ताल (Legal Investigation) की है। जानिए वो पॉइंट टू पॉइंट 4 अकाट्य तथ्य, जो प्रशासन, SECL और प्राइवेट कॉरपोरेट कंपनियों के दावों की असली तस्वीर पेश करते हैं:
1. 19 मई की जनसुनवाई का ‘पर्यावरणीय’ सच (EIA Notification 2006)
ग्रामीणों के बीच यह नैरेटिव फैला हुआ है कि जनसुनवाई में वे अपने मुआवजे, नौकरी या विस्थापन की मांग रख सकते हैं।
विधिक हकीकत: पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) के नियमों के अनुसार, 19 मई को होने वाली जनसुनवाई विशुद्ध रूप से ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ (EIA – Environmental Impact Assessment) की जनसुनवाई है। इसका जमीन के रेट या मुआवजे से कोई कानूनी लेना-देना नहीं है।
नतीजा: यदि ग्रामीण इस जनसुनवाई में सिर्फ मुआवजे और नौकरी की मांग उठाते हैं, तो अधिकारी इसे रिकॉर्ड में “विषय से बाहर” (Out of Scope) दर्ज करते हैं। इससे दिल्ली बैठे पर्यावरण मंत्रालय को यह रिपोर्ट जाती है कि “प्रोजेक्ट से पर्यावरण को होने वाले नुकसान पर स्थानीय लोगों को कोई बड़ी आपत्ति नहीं है, विवाद सिर्फ मुआवजे का है।” और प्रोजेक्ट को आसानी से ‘पर्यावरण क्लीयरेंस’ (EC) मिल जाता है।
2. SECL का नाम और MDO का मुनाफा (CBA Act 1957)
कोल ब्लॉक के लिए जमीन अधिग्रहण में सबसे बड़ा हथियार ‘कोल बेयरिंग एरिया (अधिग्रहण और विकास) अधिनियम, 1957’ (CBA Act) है।
विधिक हकीकत: CBA Act 1957 केंद्र सरकार (SECL जैसी सरकारी कंपनियों) को यह विशेष शक्ति देता है कि वह बिना ग्राम सभा की पूर्व सहमति के और बिना ‘सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट’ (SIA) के सीधे जमीन का अधिग्रहण कर सकती है।
नतीजा: जमीन ‘सार्वजनिक हित’ के नाम पर SECL के लिए अधिग्रहित की जाती है, लेकिन बाद में कोयला निकालने का पूरा ठेका MDO (Mine Developer and Operator) मॉडल के तहत किसी प्राइवेट कॉरपोरेट (जैसे- अडानी या अन्य) को दे दिया जाता है। यानी, सरकारी कानून की ताकत से जमीन ली जाती है और उसका सीधा फायदा प्राइवेट ऑपरेटर के मुनाफे में बदल जाता है।
3. ‘लीनियर प्रोजेक्ट’ के नाम पर ग्राम सभा को बाईपास करना (LARR Act – Section 10A)
खदान से कोयला बाहर निकालने के लिए रेलवे लाइन, कन्वेयर बेल्ट या सड़क की जरूरत होती है।
विधिक हकीकत: 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून (LARR Act) में संशोधन कर ‘सेक्शन 10A’ जोड़ा गया है। इसके तहत ‘लीनियर प्रोजेक्ट्स’ (एक सीध में चलने वाली परियोजनाएं जैसे रेलवे लाइन) को 70% किसानों की ‘सहमति’ (Consent) और ‘सामाजिक प्रभाव आकलन’ (SIA) से छूट (Exempt) दे दी गई है।
नतीजा: ग्रामीणों को यह बताया जाता है कि वे ‘आपसी सहमति’ से जमीन दे रहे हैं। लेकिन सच यह है कि अगर वे जमीन नहीं भी देंगे, तो भी ‘लीनियर प्रोजेक्ट’ के कानूनी प्रावधानों के तहत सरकार बिना उनकी सहमति के जमीन अधिग्रहित कर सकती है।
4. ‘4 गुना मुआवजे’ का सबसे बड़ा भ्रम (The Guideline Rate Game)
जमीन देने के लिए किसानों को सबसे बड़ा प्रलोभन बाजार मूल्य से 4 गुना मुआवजे का दिया जाता है।
विधिक हकीकत: कानूनन 4 गुना मुआवजा ‘वास्तविक बाजार मूल्य’ (Market Rate) पर नहीं, बल्कि सरकार द्वारा तय ‘गाइडलाइन रेट’ (सर्किल रेट) पर मिलता है। रायगढ़ के ग्रामीण इलाकों में सरकारी गाइडलाइन रेट, बाजार के असली भाव से कई गुना कम है।
नतीजा: एक किसान जिसकी जमीन की बाजार कीमत 50 लाख रुपये है, उसका सरकारी रेट मात्र 5-10 लाख हो सकता है। ऐसे में उसे 10 लाख का 4 गुना (40 लाख) देकर यह प्रचारित किया जाता है कि उसे बंपर मुआवजा मिला, जबकि असल में वह बाजार भाव से भी घाटे में रहता है। इसके अलावा, अधिग्रहण के वक्त अगर क्षेत्र को ‘शहरी या नगर पंचायत’ घोषित कर दिया जाए, तो यह गुणांक (Multiplier) घटकर 2 या 1 पर आ जाता है।
5. ‘आपसी सहमति’ का फॉर्म और नौकरी/पुनर्वास (R&R) सरेंडर करने का खेल
जमीन अधिग्रहण से बचने के लिए प्रशासन और कंपनी दलालों के जरिए ‘आपसी सहमति से भूमि क्रय नीति’ (Mutual Consent Policy) का कार्ड खेलते हैं।
विधिक हकीकत: किसानों को थोड़ा ज्यादा बोनस या पैसे का लालच देकर एक सहमति पत्र (Consent Form) पर साइन करवा लिया जाता है। लेकिन सबसे बड़ा कानूनी पेंच यह है कि इस ‘सहमति पत्र’ पर हस्ताक्षर करते ही किसान LARR Act 2013 के तहत मिलने वाले ‘पुनर्वास और व्यवस्थापन’ (Rehabilitation & Resettlement – R&R) के अनिवार्य अधिकारों से खुद को कानूनी रूप से बाहर कर लेता है।
नतीजा: किसान को लगता है कि उसे अपनी जमीन का एकमुश्त अच्छा पैसा मिल गया। लेकिन इस ‘सहमति’ की असली कीमत उसे अपने परिवार के सदस्य के लिए ‘पक्की नौकरी’, जीवन-यापन भत्ते (Annuity) और नई बसाहट (Resettlement) के अधिकारों को सरेंडर करके चुकानी पड़ती है। पैसा कुछ सालों में खत्म हो जाता है और किसान का परिवार बिना जमीन और बिना नौकरी के दर-ब-दर भटकने को मजबूर हो जाता है।
हमारी राय
पत्रकारिता का काम समाज और व्यवस्था के सामने सिर्फ ‘फैक्ट्स’ रखना है। हमारा काम किसी प्रोजेक्ट का विरोध या समर्थन करना नहीं है। लेकिन रायगढ़ की जनता, खासकर उन ग्रामीणों का यह मौलिक अधिकार है कि 19 मई की जनसुनवाई में हिस्सा लेने या किसी भी ‘आपसी सहमति’ पत्र पर हस्ताक्षर करने से पहले, वे इन ‘कानूनी पेंचों’ से पूरी तरह वाकिफ हों। क्योंकि नियम और कानून जब बंद कमरों में बनते हैं, तो उनका सबसे पहला शिकार खेतों में खड़ा किसान ही होता है।



