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‘केलो’ के गुनहगारों को अब 3 गांवों का ईनाम? NGT के रडार वाली ‘सिंघल स्टील’ की नई विस्तार योजना से सहमा पूर्वांचल, 6 जुलाई को जनसुनवाई

रायगढ़। क्या रायगढ़ की जीवनदायिनी ‘केलो नदी’ को जहरीले नाले में तब्दील करने वाले औद्योगिक घरानों को अब ईनाम में नए और विशाल प्लांट बांटे जा रहे हैं? यह तीखा सवाल रायगढ़ के पूर्वांचल में गूंज रहा है। पर्यावरण नियमों की अनदेखी के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के रडार पर रही ‘सिंघल स्टील प्राइवेट लिमिटेड’ अब ग्राम पतरापाली (पूर्व), कोतरलिया और सियारपाली की उपजाऊ जमीन पर 17 लाख टन का विशाल ‘ग्रीनफील्ड इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट’ लगाने जा रही है।

इस विनाशकारी प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखाने के लिए छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (CECB) ने आगामी 6 जुलाई 2026 को लोक सुनवाई (जनसुनवाई) तय कर दी है। लेकिन जनसुनवाई से पहले RIG24 की इन्वेस्टिगेटिव डेस्क ने कंपनी की हिस्ट्री समेत NGT और सरकारी जांच कमेटियों के जो दस्तावेज खंगाले हैं, वे सीधे तौर पर इस कंपनी की कार्यप्रणाली और प्रशासन की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

​सरकारी रिकॉर्ड: NGT की जांच में सामने आई ‘सिंघल’ की कमियां

सिंघल एंटरप्राइजेज की कार्यप्रणाली पहले भी NGT की जांच के दायरे में रही है। RIG24 के पास मौजूद NGT के आधिकारिक दस्तावेजों (O.A. No. 55 of 2021) और CPCB-CECB की जॉइंट कमिटी की रिपोर्ट के निष्कर्ष सीधे तौर पर कंपनी के दावों की पोल खोलते हैं:

  • ​ज़मीन के दावों में भारी विसंगति: रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने 137 हेक्टेयर ज़मीन अपने नाम होने का दावा किया था, लेकिन सरकारी जांच में यह दावा झूठा निकला। पता चला कि केवल 74.836 हेक्टेयर (करीब 38%) ज़मीन ही सीधे कंपनी के नाम पर है, बाकी ज़मीन अन्य लोगों के स्वामित्व में है।
  • ​भूजल (Groundwater) प्रदूषण का खतरा: कमेटी ने अपनी सिफारिश में स्पष्ट किया है कि कंपनी को अपने बॉटम ऐश स्टोरेज (जहां राख जमा होती है) के आसपास के भूजल की विस्तृत स्टडी करानी चाहिए, जो सीधे तौर पर जल प्रदूषण के खतरे को इंगित करता है।
  • ​33% ग्रीन बेल्ट की चोरी: जांच में पाया गया कि पर्यावरण मंजूरी की शर्तों के अनुसार 33 प्रतिशत ग्रीन बेल्ट (हरित पट्टी) की अनिवार्यता का पालन नहीं किया जा रहा था, जिसे लेकर कोर्ट को सख्त निर्देश देने पड़े।

​जांच के दिन ESP का ‘खेल’ और हाउसकीपिंग से खुली पोल

NGT के आदेश पर जब जॉइंट कमिटी ने जांच की, तो एक बड़ा तकनीकी विरोधाभास सामने आया। जांच के विशिष्ट दिन (27-28 अगस्त 2021) को प्लांट से निकलने वाला उत्सर्जन तो तय सीमा में मिला, लेकिन कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा कि “प्लांट के अंदर हाउसकीपिंग (साफ-सफाई) बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं थी।”

​औद्योगिक और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, स्पंज आयरन और कोल-बेस्ड पावर प्लांट में यह एक जाना-माना खेल है। जांच की भनक लगते ही कंपनियां दिखावे के लिए अपने ईएसपी (Electrostatic Precipitator) और प्रदूषण नियंत्रण यंत्र पूरी क्षमता पर चालू कर देती हैं। लेकिन सालों तक कोयले और राखड़ के अनियंत्रित प्रदूषण से प्लांट के भीतर जो क्रोनिक डस्ट जमती है, उसे रातों-रात पूरी फोर्स लगाकर भी साफ नहीं किया जा सकता।

यहाँ सबसे बुनियादी सवाल खड़ा होता है- जो कंपनी जांच की जानकारी होने के बावजूद अपने ही प्लांट परिसर के भीतर बुनियादी साफ-सफाई सुनिश्चित नहीं कर सकी, उससे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह पतरापाली और कोतरलिया के बाहरी पर्यावरण, कृषि भूमि और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecology) के प्रति कोई जिम्मेदारी दिखाएगी..?

CECB जनसुनवाई के दस्तावेज: केलो में घुला जहर, अब पूर्वांचल की बारी

सिंघल पर केलो नदी को प्रदूषित करने के आरोप केवल सुनी-सुनाई बातें नहीं हैं। तराईमाल (रायगढ़) में कंपनी के पुराने प्लांट की जनसुनवाई (CECB Proceeding Report) के सरकारी दस्तावेजों में ग्रामीणों की यह आपत्ति बाकायदा दर्ज है कि— “उद्योग का दूषित पानी केलो में छोड़ा जाएगा। कोयला जलाने से निकलने वाला मर्क्युरी हवा और पानी में मिलेगा, जिससे हृदय रोगी बढ़ेंगे।” खुद कंपनी के दस्तावेजों में यह उल्लेखित है कि उसकी जल आपूर्ति का स्रोत ‘छुईकंसा नाला’ है, जो सीधे तौर पर केलो की सहायक जलधारा है।

160 MW पावर प्लांट और 17 लाख टन का नया बवंडर

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार रायगढ़ पहले से ही देश के ‘गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों’ (Critically Polluted Area) की सूची में दर्ज है। यहाँ की हवा में PM10 का स्तर मानकों से 3 गुना अधिक है।

​अब 6 जुलाई को जिस प्रोजेक्ट की जनसुनवाई होनी है, उसमें मुख्य स्टील यूनिट (17 लाख टन TPA), पेलेट प्लांट (12 लाख TPA), कोल वाशरी (6 लाख TPA) और 160 मेगावॉट (MW) का कैप्टिव पावर प्लांट शामिल है। पूर्वांचल के ग्रामीणों का आरोप है कि 100 से ज्यादा उद्योगों के प्रदूषण से पहले ही उनकी खेती चौपट हो चुकी है। इस नए मेगा प्रोजेक्ट से पतरापाली और कोतरलिया की बची-खुची धान और महुआ की किसानी भी खत्म हो जाएगी और स्थानीय युवाओं को नौकरी के नाम पर केवल राखड़ फांकने के लिए छोड़ दिया जाएगा।

RIG24 का क्लियर स्टैंड

‘नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली’… सिंघल स्टील के इस नए 17 लाख टन के प्रोजेक्ट पर यह मुहावरा एकदम सटीक बैठता है। 6 जुलाई को पतरापाली में होने वाली लोक सुनवाई क्या केवल एक कागजी औपचारिकता है? जो कंपनी पहले से ज़मीन के रकबे को लेकर भ्रामक जानकारी दे चुकी हो, जिसके भीतर की हाउसकीपिंग NGT की कमिटी को खराब मिली हो और जो केलो नदी के प्रदूषण के आरोपों में घिरी हो, वह अब ‘ग्रीनफील्ड’ (हरित) प्रोजेक्ट लगाने का दावा कर रही है। प्रशासन और पर्यावरण विभाग (CECB) को 6 जुलाई की जनसुनवाई में पब्लिक को इन ऑन-रिकॉर्ड दस्तावेजों का जवाब देना ही होगा, वरना यह रायगढ़ के पर्यावरण के साथ एक बड़ा विधिक धोखा होगा।

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