रायगढ़। किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के आने से पहले प्रशासन और कंपनी ‘विकास’ के बड़े-बड़े दावे करते हैं। लेकिन तमनार ब्लॉक के पेलमा कोल ब्लॉक (लगभग 2077 हेक्टेयर क्षेत्र) में जो तस्वीर उभर रही है, वह विकास की नहीं, बल्कि अविश्वास और एक अनजाने कॉर्पोरेट खौफ की है।
आगामी 8 जून को प्रस्तावित पर्यावरण जनसुनवाई से पहले पेलमा, उरबा, लालपुर, हिंजर और मिलूपारा समेत 8 प्रभावित गांवों के ग्रामीणों में जमीन की कीमत, विस्थापन, नौकरी और मुआवजे को लेकर जो गुस्सा उबल रहा है, वह सीधे तौर पर प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करता है।

एसडीएम और कलेक्टर को दिए गए आवेदनों पर चुप्पी
यह विरोध रातों-रात नहीं भड़का है। विस्थापन और मुआवजे की ठोस गारंटी की मांग को लेकर प्रभावित गांवों के लोग समय-समय पर एसडीएम से लेकर रायगढ़ कलेक्टर तक करीब आधा दर्जन से ज्यादा लिखित आवेदन सौंप चुके हैं। पहले 18 मई, 1 जून , 2 जून.. तपती गर्मी में भी सैकड़ो ग्रामीण जिला कलेक्टर पहुंचे और ज्ञापन दिया!जिसमें जमीन की कीमत, विस्थापन, नौकरी और मुआवजे की ही बात कही गई थी…

विडंबना देखिए कि भले ही भारी विरोध के चलते जनसुनवाई की तारीख 19 मई से खिसकाकर 8 जून कर दी गई, लेकिन लगभग 20 दिन पहले दिए गए मुख्य ज्ञापनों पर आज तक प्रशासन ने न तो कोई बैठक बुलाई है और न ही धरातल पर कोई कार्रवाई नजर आई है। ग्रामीणों को सिर्फ ‘मौखिक आश्वासन’ का झुनझुना थमाया गया है। लेकिन ग्रामीण अब समझ चुके हैं कि इन मौखिक बातों का कोई मोल नहीं है, सच्चाई वही है जो ‘सरकारी सील’ के साथ अवार्ड (मुआवजा पत्रक) पर दर्ज की जाएगी, इसलिए तो उन्होंने 8 जून जनसुनवाई से पहले इसकी लिखित पुष्टि मांग की है!
अडानी की बैकएंड एंट्री और बांटे गए सामानों की कलेक्ट्रेट में वापसी
कागजों पर भले ही यह खदान SECL (भारत सरकार) की है, लेकिन 23 अगस्त 2023 को हुए MDO (माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर) एग्रीमेंट के जरिए बैकएंड से ‘अडानी प्रबंधन’ की जो एंट्री हुई है, असल में उसी ने ग्रामीणों के भीतर ‘छले जाने’ का खौफ पैदा किया है।
इसी खौफ को दबाने और लोगों को प्रलोभन देने के लिए कंपनी प्रबंधन द्वारा हाल ही में ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरत के कुछ सामान बांटे गए थे। लेकिन अपने जल-जंगल और जमीन के लिए अड़े इन आदिवासियों ने अपने स्वाभिमान का परिचय देते हुए, वह सारा सामान रायगढ़ जिला कलेक्ट्रेट ऑफिस में लाकर वापस कर दिया और प्रबंधन की बाकायदा लिखित शिकायत भी दर्ज कराई। यह घटना प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संदेश थी कि यह आंदोलन अब किसी लालच से नहीं टूटेगा।
तो क्या 8 जून को सिर्फ एक ‘रस्म अदायगी’ होगी?
अब जरा जमीनी हकीकत और समय के गणित को समझिए। ग्रामीणों की स्पष्ट मांगें हैं, कलेक्टर गाइडलाइन की जगह एक समान जमीन का रेट, 2 एकड़ जमीन पर SECL की स्थायी नौकरी, और जिनके पास पट्टे नहीं हैं (भूमिहीन) उन्हें भी उचित मुआवजा देना।
( ग्रामीणों के आवेदन के बारे मे बताते हुए रायगढ़ अपर कलेक्टर)
क्या यह सब जनसुनवाई से पहले कुछ दिनों के भीतर होने वाला काम है? जवाब है.. बिल्कुल नहीं! जिस प्रशासन ने 20 दिन पुराने आवेदनों पर एक बैठक तक नहीं बुलाई, उसके लिए जनसुनवाई से पहले जमीन का फाइनल ‘अवार्ड’ पास करना और नौकरी की कागजी गारंटी देना धरातल पर पूरी तरह से नामुमकिन लगता है।
“और एक बार जनसुनवाई हो गई, तो उसके बाद ग्रामीणों के इस दबाव का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा! बंद कमरों में सब कुछ डिसाइड हो जाएगा! अंत में उनके हाथ में जो थमाया जाएगा, वह सिर्फ एक ‘सरकारी कागज’ होगा… और उसमें शर्तें किसके मुनाफे के हिसाब से तय होंगी, यह पूरा रायगढ़ जानता है..??”
सीधा सवाल:
जब प्रशासन के पास मांगों को पूरा करने का न तो समय है और न ही कोई स्पष्ट नीयत दिखाई दे रही है, तो ऐसे में 8 तारीख की जनसुनवाई का औचित्य क्या रह जाता है?
क्या 8 जून को सिर्फ वही होगा जो हमेशा से होता आ रहा है? यानी, भारी पुलिस बल की तैनाती के बीच पर्यावरण मंजूरी (EC) के लिए जनसुनवाई का ‘कोरम’ पूरा कर लिया जाएगा और आदिवासियों के आवेदन एक बार फिर ठंडे बस्ते में डाल दिए जाएंगे? प्रशासन को यह समझना होगा कि बिना ‘अवार्ड’ फाइनल किए और बिना लिखित गारंटी के पेलमा में खदान खोदने की राह इतनी आसान नहीं होने वाली है।
-आशीष शर्मा ( प्रधान संपादक, RIG24)



