रायगढ़। आज 17 सितंबर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन। देश भर में महीने भर चलने वाले ‘सेवा पखवाड़े’ का ढोल पीटा जा रहा है। रायगढ़ में भी उत्साह ऐसा कि पांच लाख दीये जलाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय हुआ है.., जिसमें से 40 हजार दीये अकेले नवनिर्मित सिंदूर पार्क में झिलमिलाने हैं। लेकिन रोशनी के इस पूरे तमाशे के बीच, पुसौर नगर पंचायत से उठा सियासी धुआं सीधे रायगढ़ भाजपा के चेहरे पर कालिख पोत गया। प्रधानमंत्री को तोहफे के रूप में आठ भाजपा पार्षदों ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से सामूहिक इस्तीफे की पेशकश कर दी है।

पार्षदों का दर्द सीधा और बुनियादी है, जो उन्होंने लिख कर भी दिया है.. नगर पंचायत अध्यक्ष और स्थानीय प्रशासन का तानाशाही रवैया। नौबत यह आ चुकी है कि अपनी ही सरकार में पार्षद अपनी ही निधि का उपयोग सड़क, नाली, बिजली और पानी जैसी प्राथमिक जरूरतों के लिए नहीं कर पा रहे। विकास के नाम पर ‘शून्यता’ का यह आलम उस जिले में है, जहां सत्ता के सबसे चमकदार चेहरे की तूती बोलती है!
‘सेवा पखवाड़ा’ मंच पर, पार्षद लाचार फर्श पर
फिलहाल, इन आठ पार्षदों का इस्तीफा सोशल मीडिया पर तैर रहा है और जिले के बड़े नेताओं के होठों पर रहस्यमयी चुप्पी चिपक गई है। जिलाध्यक्ष ने तकनीकी रूप से इस्तीफा मंजूर नहीं किया है और न ही करेंगे.. क्योंकि अनुशासन का पर्दा जो बचाना है! मान-मनौव्वल की बंद कमरे वाली स्क्रिप्ट चालू हो चुकी है। पार्षदों के गुस्से की सुई सीधे नगर पंचायत अध्यक्ष मोहित सतपथी पर टिकी है, जिन्हें पूर्व विधायक का वरदहस्त प्राप्त माना जाता है। सवाल यह है कि जब सत्ता में बैठे अपने ही नुमाइंदे बुनियादी काम न करा पाने की जिल्लत झेल रहे हों, तो उस संगठन का नियंत्रण वास्तव में किसके हाथ में है?
रवि भगत का सबक और ‘ऑल इज वेल’ का छलावा
यह कोई पहली बगावत नहीं है। रायगढ़ ने हाल ही में भाजयुमो के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रवि भगत का हश्र देखा है। उन्होंने अपने गृह क्षेत्र की जर्जर सड़कों को लेकर जब आवाज उठाई, तो पार्टी ने समस्या सुलझाने के बजाय उनका इस्तीफा जेब में रख लिया। आज रवि भगत अपनी ही सरकार के सामने एक मुखर विपक्ष बनकर खड़े हैं। भगत का सबक क्या संगठन के लिए काफी नहीं था, जो आज प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर यह नया सियासी गुल खिलाया गया?
रायगढ़ भाजपा के मौजूदा शक्ति-संतुलन पर नजर डालें तो किसी को कोई मुगालता नहीं होना चाहिए। पूर्व आईएएस और वर्तमान कद्दावर मंत्री ओपी चौधरी ही यहां के ‘सर्वेसर्वा’ हैं। संगठन की हर धुरी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है; जिलाध्यक्ष से लेकर वार्ड स्तर तक वही पत्ता हिलता है जिसे वे हिलाना चाहें। अगर प्रशासनिक दक्षता का तमगा लेकर चलने वाले एक पूर्व कलेक्टर के सीधे नियंत्रण के बावजूद आठ जनप्रतिनिधि एक साथ बगावत की राह पकड़ लें, तो यह ‘ऑल इज वेल’ के ढोल में एक बहुत बड़ा छेद है।
‘उत्सवी देवता’ बनाम बेबस सिपहसालार
तल्ख हकीकत यह भी है कि मंत्री जी अपने क्षेत्र के लिए किसी ‘उत्सवी देवता’ की मानिंद हो चुके हैं; जो सिर्फ बड़े आयोजनों, फीता-काट अभियानों और त्योहारों पर ही दर्शन देते हैं। राजधानी और रायगढ़ के बीच की यह भौगोलिक व संवादहीन दूरी अब कार्यकर्ताओं के सीने में टीस बनकर बैठ चुकी है।
हो सकता है शाम ढलते-ढलते रूठे हुए पार्षदों को साध लिया जाए, बंद कमरों में डांट-डपट या दिलासों की चाशनी से मामला रफा-दफा भी हो जाए। लेकिन खुद को कैडर-बेस्ड और अनुशासित कहने वाली पार्टी के सर्वोच्च नेता के जन्मदिन पर, उसी के अपने सिपहसालारों द्वारा दिया गया यह ‘सामूहिक इस्तीफे का रिटर्न गिफ्ट’ रायगढ़ भाजपा की अंदरूनी सड़ांध को जगजाहिर करने के लिए काफी है!
-आशीष शर्मा, संपादक RIG24









