रायगढ़। कहते हैं जब VIP बड़ा हो, तो तैयारी भी उसी लेवल की होनी चाहिए। लेकिन रायगढ़ के केजी (डिग्री) कॉलेज में 2 नवंबर को जो हुआ, उसने पूरे प्रशासन की तैयारियों की पोल खोल कर रख दी। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर रायगढ़ विधायक और प्रदेश के कद्दावर वित्त मंत्री ओपी चौधरी जी पधारे थे। छत्तीसगढ़ की राजनीति में उनका क्या ‘भौकाल’ है, यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन ऐसी VVIP मौजूदगी में कॉलेज प्रबंधन ‘राष्ट्रगीत’ का क्रम ही भूल गया!
अब ‘RIG तड़का’ का ध्यान इस बात पर गया है कि गलती छोटी-मोटी नहीं थी। रायगढ़ मीडिया में चली खबर और छात्र नेता शशांक पाण्डेय द्वारा कलेक्टर को दिए गए आवेदन के मुताबिक, खुद मंत्री ओपी चौधरी जी को बीच में हस्तक्षेप कर गायन का क्रम सुधरवाना पड़ा। सोचिए, जिनके इशारे पर पूरे प्रदेश का बजट सेट होता है, उनके सामने कॉलेज प्रबंधन अपना ‘वंदे मातरम’ का सीक्वेंस सेट नहीं कर पाया!

जब फजीहत इतनी बड़ी हो, तो प्रबंधन को शालीनता से माफी मांग लेनी चाहिए। लेकिन यहाँ ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत चरितार्थ हो गई। शिकायत के अनुसार, जब एक पूर्व छात्र नेता ने इस बड़ी चूक की ओर ध्यान दिलाया, तो 2 दिन पहले ही ‘प्राचार्य’ की कुर्सी पर आसीन हुए आनंद शर्मा जी का ईगो हर्ट हो गया। आवेदन में सीधा आरोप है कि शर्मा जी ने गलती मानने के बजाय सरेआम छात्र की ‘नेतागिरी उतारने’ की धमकी दे डाली। दबी जुबान में चर्चा है कि VVIP अतिथि के सामने हुई फजीहत की खिसियाहट, बेचारे छात्र पर निकाल दी गई।

‘स्वास्थ्य’ का हवाला: क्या यह वही पुराना ‘कोटा’ वाला मास्टरस्ट्रोक है?
मामला यहीं नहीं रुका। छात्र नेता ने जो पलटवार किया है, उसने कॉलेज की पुरानी पॉलिटिक्स को फिर से हवा दे दी है। कलेक्टर को सौंपे गए पत्र में छात्र नेता ने बड़ी मासूमियत से लिखा है कि प्राचार्य ने खुद को ‘विशेष स्वास्थ्य परेशानियों’ से ग्रसित बताया है, इसलिए उन्हें कार्यभार से मुक्त कर देना चाहिए।
अब रायगढ़ के जो लोग प्राचार्य जी के पुराने ‘कॉमर्स कॉलेज’ वाले कार्यकाल और उनके ‘विशेष कोटे’ की इनसाइड स्टोरी जानते हैं, वो समझ गए हैं कि छात्र नेता ने कहां और कितनी गहरी चोट की है! न सीधे तौर पर किसी ‘कोटे’ का नाम लिया, और न ही कोई असंसदीय बात कही। बस सीधे कलेक्टर साहब से ‘बीमार प्राचार्य’ को आराम देने की मांग कर दी। ‘एक तीर से दो शिकार’ इसी को कहते हैं!

अब देखना दिलचस्प होगा…
अब सवाल यह उठता है कि प्रदेश के सबसे ताकतवर मंत्रियों में से एक के सामने राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान जैसी चूक करने के बाद प्रबंधन पर क्या एक्शन होता है? या फिर हमेशा की तरह ‘जुगाड़ के देवता’ एक बार फिर अपने ‘स्वास्थ्य कारणों’ को ढाल बनाकर इस नए विवाद से भी बाइज्जत बरी हो जाएंगे?









