रायगढ़: देश के ऊर्जा क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले रायगढ़ जिले के कोयलांचल में मजदूरों के व्यापक शोषण का गंभीर मामला सामने आया है। छाल खदान में कथित महाघोटाले की जांच के लिए कलेक्टर द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट ने इस क्षेत्र में चल रही संगठित धांधली और श्रम कानूनों के उल्लंघन का पर्दाफाश किया है। रिपोर्ट के अनुसार, सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की खदानों में आउटसोर्सिंग कंपनियों के ठेकेदार श्रम कानूनों का उल्लंघन कर मजदूरों का आर्थिक शोषण कर रहे हैं।
यह रिपोर्ट सिर्फ छाल खदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रायगढ़ जिले की अन्य प्रमुख खदानों में भी प्रचलित ‘आधुनिक बंधुआ मजदूरी’ जैसे हालात की ओर इशारा करती है। जांच समिति ने ठेका कंपनी और ठेकेदारों की मिलीभगत से हो रही अनियमितताओं को प्रमाणित किया है।
जांच रिपोर्ट के चौंकाने वाले खुलासे
डिप्टी कलेक्टर शिल्पा भगत, सहायक श्रम आयुक्त घनश्याम पाणिग्राही, उप संचालक (आईएचएसडी) राहुल पटेल, खनिज अधिकारी रमाकांत सोनी और संबंधित तहसीलदार की संयुक्त टीम ने मजदूरों से सीधे बातचीत कर जो जानकारियां जुटाईं, वे बेहद गंभीर हैं:
- वेतन में भारी कटौती: हाई पावर कमेटी (HPC) द्वारा निर्धारित अकुशल और अर्धकुशल मजदूरों का मासिक वेतन लगभग ₹40,000 है। कागजों में यह पूरी राशि दिखाई जाती है, लेकिन मजदूरों को वास्तव में केवल ₹10,000 से ₹12,000 ही दिए जाते हैं। बाकी ₹28,000 ठेकेदारों द्वारा हड़प लिए जाते हैं।
- दोहरी भुगतान प्रणाली: खदानों में दोहरी भुगतान प्रणाली चल रही है। कुछ चुनिंदा कर्मचारियों को बैंक के माध्यम से पूरा भुगतान दिखाकर श्रम विभाग को गुमराह किया जाता है, जबकि अधिकांश मजदूरों को ‘कच्चे’ में नकद भुगतान किया जाता है, जिसका कोई कानूनी रिकॉर्ड नहीं होता।
- फर्जी मस्टर रोल: दैनिक रूप से काम करने वाले सैकड़ों मजदूरों में से केवल 30 से 40 प्रतिशत के नाम ही हाजिरी रजिस्टर में दर्ज किए जाते हैं। इसका उद्देश्य किसी दुर्घटना की स्थिति में ठेका कंपनी को जिम्मेदारी से बचने का मौका देना है।
- सुरक्षा और बीमा का अभाव: जहरीली गैस, कोल-डस्ट और ब्लास्टिंग जैसे खतरनाक माहौल में काम करने वाले मजदूरों का न तो कोई मेडिकल क्लेम है और न ही जीवन बीमा। बीमार या घायल होने पर उन्हें छोड़ दिया जाता है, और दुर्घटना में मृत्यु होने पर शवों को ठिकाने लगाने के लिए दलाल सक्रिय हो जाते हैं।
- पेटी-ठेकेदारों का जाल: खनन कंपनियां काम को बड़ी आउटसोर्सिंग फर्मों को देती हैं, जो आगे स्थानीय ‘पेटी-ठेकेदारों’ को मैनपावर का काम सौंप देती हैं। इस त्रि-स्तरीय व्यवस्था में मजदूरों की सुरक्षा और गरिमा पूरी तरह से उपेक्षित रहती है।
नियामक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल
इस संगठित शोषण के पीछे नियामक संस्थाओं की उदासीनता एक बड़ा कारण है। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ माइंस सेफ्टी (DGMS), जो खदानों में सुरक्षा मानकों की निगरानी के लिए जिम्मेदार है, उसने जिले की खदानों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की है। इसी तरह, केंद्रीय श्रम विभाग के अधिकारी भी खदानों के भीतर की वास्तविक स्थिति से अनभिज्ञ प्रतीत होते हैं, जिसके कारण ठेकेदारों का दुस्साहस लगातार बढ़ रहा है।
फिलहाल कलेक्टर की जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, जिसमें मजदूरों के बयान और दस्तावेजी अनियमितताएं प्रमाणित हो चुकी हैं। अब जिला प्रशासन और राज्य सरकार से अपेक्षा है कि वे केवल नोटिस जारी करने की बजाय, दोषी ठेकेदारों और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करें।








