मौसम अनुकूल न रहने के कारण रायगढ़ जिला सहित आसपास के इलाकों में धान की फसल पर मंडरा रहा है रोग का खतरा। कृषि विज्ञान केन्द्र रायगढ़ ने धान उत्पादक किसानों के लिए विशेष अलर्ट जारी किया है, जिसमें समय पर रोग की पहचान और वैज्ञानिक प्रबंधन पर जोर दिया गया है।
वरिष्ठ वैज्ञानिक बी.एस. राजपूत और विषय वस्तु विशेषज्ञ दीपमाला लकड़ा ने बताया कि वर्तमान मौसम की स्थिति में झुलसा, जीवाणु जनित झुलसा, पर्णच्छद झुलसा, तना सड़न, भूरा धब्बा और कंडुआ रोग जैसी बीमारियां तेजी से फैल सकती हैं। उन्होंने किसानों से अपील की है कि लक्षण दिखने पर जांच-पड़ताल को नजरअंदाज न किया जाए।
ब्लास्ट और जीवाणु झुलसा: पहचान और बचाव
धान में ब्लास्ट रोग फफूंद के कारण पत्तों पर छोटे धब्बों से शुरू होकर नाव के आकार के घावों तक पहुंच जाता है। इसके अलावा जीवाणु जनित झुलसा में पत्तों के ऊपरी सिरे से हरे-पीले धब्बे पानी बहने की तरह फैलते हैं। दोनों ही स्थितियों में नाइट्रोजन उर्वरक की अत्यधिक मात्रा फायदे के बजाय नुकसान करती है। वैज्ञानिक राजपूत ने स्पष्ट किया कि नाइट्रोजन को विभाजित मात्रा में दिया जाए और केवल प्रमाणित बीज का उपयोग करने पर जोर दिया।
दोनों बीमारियों के प्रबंधन के लिए रोगरोधी किस्मों का चुनाव, सही पौध घनत्व और संतुलित उर्वरक प्रबंधन जरूरी है। प्राकृतिक संक्रमण की स्थिति में कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेकर ही कवकनाशी का छिड़काव करना चाहिए, ताकि रासायनिक खर्च की बर्बादी रोकी जा सके।
तना सड़न और भूरा धब्बा: बुवाई से पहले की तैयारी
धान में तना सड़न और भूरा धब्बा दोनों ही बीजजनित रोग हैं। तना सड़न की शुरुआत में गभोट पर भूरे धब्बे बनते हैं और अधिक प्रकोप होने पर बालियां बाहर नहीं निकल पातीं। इसका प्रसार रोकने के लिए नमक के घोल से बीज की जांच और मेंकोजेब़ कार्बेण्डजीम (2 ग्राम प्रति किलोग्राम) से बीज उपचार अनिवार्य है।
भूरा धब्बा पत्तियों पर पीले घेरे वाले भूरे धब्बों के रूप में दिखता है। इंदिरा राजेश्वरी, बम्लेश्वरी और इंदिरा सुगंधित धान-1 जैसी रोगरोधी किस्में इसके लिए अनुशंसित हैं। शुरुआती लक्षण पर थाइफ्लूजामाइड, प्रोपिकोनाजोल या हेक्साकोनाजोल के छिड़काव की सलाह दी गई है।
पर्णच्छद झुलसा और कंडुआ रोग: नमी पर नियंत्रण
पर्णच्छद झुलसा में पत्तों पर तांबे के रंग के धब्बे बनते हैं जो बाद में धूसर हो जाते हैं। किसानों को चेतावनी दी गई है कि खेत में अतिरिक्त नमी और पौधों की घनी बुवाई से बचें। संक्रमित अवशेषों का निपटान करना अनिवार्य है।
कंडुआ रोग (फॉल्स स्मट) में दाने पीले या हरे-काले पाउडर में बदल जाते हैं। मौसम में अधिक नमी वाले दिनों में यह तेजी से फैलता है। कृषि विज्ञान केन्द्र ने सलाह दी है कि बाली निकलने से पहले नियमित निगरानी करें और जरूरत पड़ने पर कृषि विशेषज्ञों से संपर्क कर कवकनाशी का प्रयोग करें।
किसानों को एक बार फिर याद दिलाया गया है कि स्वयं से दवा के प्रयोग से बचें। कृषि विभाग अथवा कृषि विज्ञान केन्द्र के विशेषज्ञों से सलाह लेकर ही अनुशंसित मात्रा में कवकनाशी और अन्य उपचार करें। जिम्मेदारी से किया गया प्रबंधन फसल को बड़े नुकसान से बचा सकता है।








