रायगढ़। राजनीति में जब किसी पद के लिए तीन साल तक माथापच्ची चले, तो उम्मीद की जाती है कि परिणाम ‘सर्वमान्य’ होगा। लेकिन रायगढ़ नगर निगम के लिए भाजपा द्वारा जारी 8 एल्डरमैन की बहुप्रतीक्षित सूची ने पार्टी के भीतर ऐसा राजनीतिक ‘रायता’ फैला दिया है, जिसे समेटना अब स्थानीय संगठन के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
रायगढ़ निगम एल्डर मैंन शुरू से ही संगठन के लिए एक ‘सिरदर्द’ रहा है, यही वजह है कि यहाँ का नंबर दूसरी लिस्ट में आया। लेकिन लिस्ट आते ही जो बगावत पहले केवल बंद कमरों की कानाफूसी तक सीमित थी, वह अब सोशल मीडिया के चौराहों पर खुल्लम-खुल्ला आ गई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या भाजपा रायगढ़ में ‘निष्ठावानों’ की पार्टी रह गई है, या फिर यह ‘आयातित नेताओं’ और ‘जुगाड़ तंत्र’ का नया शरणस्थली बन चुकी है?
वाइट लिस्ट में पांच नाम
सूची में ज्ञानेश्वर गौतम, मनोज शर्मा, मनीष गांधी, प्रदीप श्रृंगी और शशिकांत शर्मा.. ये पांच नाम पहले से ही तय माने जा रहे थे। इनकी निष्ठा, पार्टी के प्रति समर्पण और जमीनी पकड़ पर संगठन में कोई प्रश्नचिह्न नहीं है। ज्ञानेश्वर गौतम और शशिकांत शर्मा जैसे पूर्व मंडल अध्यक्षों का इस सूची में होना उनके राजनीतिक कद के हिसाब से थोड़ा ‘हल्का’ जरूर है, लेकिन एक समर्पित सिपाही की तरह उन्होंने इसे स्वीकार किया है। वहीं, स्व. भग्गू भाई गांधी के पुत्र मनीष गांधी का दशकों का जमीनी संघर्ष और वर्तमान कार्यालय प्रभार उनके नाम को निर्विवाद बनाता है।
भगवा गमछा, आरएसएस कोटा और ‘कांग्रेस’ का बैकएंड!
बवाल इन पांच नामों पर नहीं, बल्कि बाकी बचे उन तीन ‘विवादित’ चेहरों पर है, जिन्होंने रायगढ़ भाजपा की वैचारिक जड़ों पर प्रहार कर दिया है।
सुनील थवाईत: युवा मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष सूरज शर्मा ने इनका खुलकर विरोध किया है। आरोप बेहद गंभीर हैं! वार्ड चुनावों में कांग्रेस के ‘बैकएंड सिपाही’ के रूप में काम करना और भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का ‘खास’ होना। अगर यह सच है, तो भाजपा ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है।

पप्पू कुमार (पप्पू पांडे): नया-नया भगवा गमछा ओढ़कर आए पप्पू पांडे के खिलाफ पुराने जमीनी कार्यकर्ताओं ने लिखित शिकायतें तक की थीं। लेकिन संगठन ने पुराने कार्यकर्ताओं के रोष को रद्दी की टोकरी में डाल दिया और पैराशूट से उतरे नेता को कुर्सी सौंप दी।

संजय जगवानी: सिंधी समाज के समीकरण के नाम पर जगवानी को एल्डरमैन बनाया गया, लेकिन सच्चाई यह है कि समाज में इनकी कोई खास पैठ नहीं है। इनकी नियुक्ति शुद्ध रूप से ‘आरएसएस कोटा’ की उपज मानी जा रही है।
’महतारी वंदन’ का ढिंढोरा और मातृशक्ति का अपमान
इस सूची का सबसे डार्क और कड़वा पहलू महिलाओं की एकतरफा अनदेखी है। जो पार्टी 33% महिला आरक्षण का बिल पास करने पर अपनी पीठ थपथपाती है और ‘महतारी वंदन योजना’ के नाम पर चुनावी वैतरणी पार करती है, उसने रायगढ़ में अपनी ही महिला कार्यकर्ताओं का टिकट काट दिया!

कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली महत्वाकांक्षी महिला नेत्रियों का गुस्सा अब चरम पर है। स्थिति यहाँ तक आ गई है कि अब भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष मधुलता पटेल पर भी सीधे तंज कसे जा रहे हैं। दबी जुबान में सवाल उठ रहे हैं कि ‘कांग्रेस से आयातित’ होने के बावजूद उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी कैसे मिल गई, और वे अपनी ही नेत्रियों का हक क्यों नहीं दिला पाईं?

अग्रवाल समाज आउट, ‘पावर सेंटर’ की हार?
इस पूरी सूची में रायगढ़ के सबसे प्रभावशाली ‘अग्रवाल समाज’ का पूरी तरह से साफ होना एक बड़े राजनीतिक संदेश की ओर इशारा करता है। ऐश अग्रवाल और बाबूलाल अग्रवाल के नाम पहली लिस्ट में चर्चा में थे। इनकी प्रदेश के एक कद्दावर मंत्री (ओपी चौधरी) से नजदीकी जगजाहिर है। इसके बावजूद शीर्ष नेतृत्व द्वारा इनका नाम काटा जाना यह बताता है कि स्थानीय ‘पावर सेंटर’ की उतनी चली नहीं, या फिर जानबूझकर उन नामों को दरकिनार कर दिया गया।
यह जश्न नहीं, ‘रेड अलर्ट’ है
फिलहाल लिस्ट आ गई है। मिठाइयां , बधाइयां दी जा रही हैं और साथ ही हर नेता की ‘राजनीतिक कुंडली’ भी बांची जा रही है। कुछ दिनों में यह शोर शांत भी हो जाएगा। लेकिन संगठन को यह नहीं भूलना चाहिए कि लंबे इंतजार के बाद आई इस लिस्ट ने रायगढ़ भाजपा की नींव में एक ऐसी ‘चिंगारी’ लगा दी है, जो आने वाले चुनावों में दावानल बन सकती है। दरकिनार किए गए जमीनी कार्यकर्ता और अपमानित मातृशक्ति इस बार फिर खून का घूंट पीकर रह जाएंगे। रायगढ़ भाजपा के लिए यह जश्न का नहीं, बल्कि एक स्पष्ट ‘रेड अलर्ट’ की शुरुआती चेतावनी है!
-आशीष शर्मा, प्रधान संपादक RIG24



