छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित शोकसभा के नाम पर पूरे दिन के लिए अदालती कामकाज स्थगित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने 72 वर्षीय बुजुर्ग याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि किसी दिवंगत अधिवक्ता या न्यायिक अधिकारी को श्रद्धांजलि देना एक सम्मानजनक परंपरा है। लेकिन इसकी वजह से पूरे दिन अदालती काम रोकना पूरी न्याय व्यवस्था को प्रभावित करता है।
मामला रायपुर के एक 72 वर्षीय बुजुर्ग से जुड़ा है, जो छत्तीसगढ़ किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत बेदखली आदेश के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। रायपुर किराया नियंत्रक ने जिला बार एसोसिएशन की शोकसभा का हवाला देते हुए मामले की सुनवाई टाल दी थी और अगली तारीख दे दी थी।
बुजुर्ग याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और बताया कि शोकसभा, प्रशासनिक कार्य या अधिकारियों की अनुपलब्धता के नाम पर बार-बार तारीखें बढ़ा दी जाती हैं। इससे त्वरित न्याय का मकसद खत्म हो जाता है और आम जनता को मानसिक व आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ती है।
हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए किराया नियंत्रक के उस आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि न्याय तक निर्बाध पहुंच संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का अभिन्न हिस्सा है। वकीलों की हड़ताल और कार्य बहिष्कार पहले ही अवैध हैं, इसलिए केवल शोकसभा के नाम पर पूरे दिन काम बंद रखना गलत है।









