रायगढ़/तमनार (RIG24)। कागजों पर यह ‘पर्यावरण जनसुनवाई’ भारत सरकार की महारत्न कंपनी SECL के पेलमा खदान प्रोजेक्ट के लिए थी। लेकिन तमनार के पंडाल में SECL सिर्फ एक ‘मुखौटा’ बनकर बैठी थी, और असली ‘रिमोट कंट्रोल’ अडानी के मैनेजमेंट के हाथ में था। जनसुनवाई के नाम पर प्रशासन और कॉर्पोरेट ने मिलकर एक ऐसा ‘स्क्रिप्टेड शो’ (Scripted Show) चलाया, जिसमें असली किसानों की आवाज को बाउंसरों और ‘प्लांटेड’ भाषणों के शोर में दफन कर दिया गया।
कोरबा के बाउंसर और ‘इवेंट मैनेजर’ बनी पुलिस!
स्थानीय लोगों और विश्वसनीय सूत्रों ने बताया कि जनसुनवाई से पहले ही शांति व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में तमनार पुलिस ने सरपंचों और ग्रामीणों को हिदायत दे दी थी कि “कोई भी किसी प्रकार की मीटिंग नहीं करेगा और बाहरी लोगों को प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा।”

अब यहा खेला देखिए! पुलिस ने किसानों के समर्थकों को तो ‘बाहरी’ बताकर रोक दिया, लेकिन अडानी मैनेजमेंट ने भीड़ को डराने के लिए जो ‘पुरुष और महिला बाउंसर’ कोरबा से मंगवाए थे, उनके लिए सारे दरवाजे खुले थे! वहां खौफ का आलम ऐसा था कि अगर कोई वहां की तस्वीर भी खींचे तो उसके पीछे घूरने के लिए एक बाउंसर आपको जरूर खड़ा मिलता। (नीचे तस्वीर में आप इसे देख सकते हैं—एक लड़की वीडियो बना रही है और ठीक उसके पीछे मुस्तैद खड़ी है महिला बाउंसर!) सोचिए कितना डर और कितनी तगड़ी मुस्तैदी थी वहां पर..??

अब सोचिए कितना निष्पक्ष रूप से हुई जनसुनवाई..? यह पुरानी कहावत है ना ‘बिल्ली से दूध की रखवाली करवाना!’ लगभग यही सिनारियों था वहां..

कानून-व्यवस्था संभालने वाली पुलिस तो वहां सिर्फ एक ‘इवेंट मैनेजर’ की भूमिका में नजर आ रही थी, जबकि असली पहरेदारी कोरबा के ये बाउंसर कर रहे थे।
‘प्लांटेड’ भीड़ और 4 घंटे की ‘स्क्रिप्टेड’ बकवास
नाम ना बताने की शर्त पर एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि 6 घंटे की जनसुनवाई में से 3-4 घंटे सिर्फ 6-8 लोगों ने खा लिए! ये लोग एक-एक, दो-दो घंटे तक माइक पर भाषण देते रहे। असल में ये अडानी मैनेजमेंट के ही ‘तोते’ थे। रणनीति साफ थी.. समय बर्बाद करो, ताकि जो असली प्रभावित ग्रामीण हैं, उन्हें “हाँ या ना” बोलने का मौका ही न मिले।
और तो और, पंडाल में ‘समर्थन’ दिखाने के लिए जो भीड़ बैठी थी, स्थानीय लोगों के मुताबिक उसमें से कई चेहरे दूसरे प्लांट से लाए गए कर्मचारी और ठेका मजदूर थे। यानी ‘भीड़’ भी किराए की और ‘भाषण’ भी प्रायोजित!
अक्षय कुमार के लिए ‘रेड कार्पेट’, और किसानों के लिए ‘बैरिकेड’!
इस पूरी जनसुनवाई का सबसे बड़ा पाखंड तो सिस्टम का वह ‘दोहरा मापदंड” है, जो 2022 में दिखा था। याद कीजिए, अक्टूबर 2022 में जब बॉलीवुड एक्टर अक्षय कुमार ‘रानीगंज खदान हादसे’ (फिल्म: मिशन रानीगंज) की शूटिंग के लिए चार्टर्ड प्लेन से रायगढ़ आए थे, तब प्रशासन ने इन ‘बाहरी’ एक्टर के लिए खदानों के दरवाजे खोल दिए थे।

एक ‘बाहरी’ एक्टर खदान में फंसे मजदूरों को बचाने की ‘रील लाइफ’ (Reel Life) कहानी शूट कर रहा था, तो सिस्टम ने रेड कार्पेट बिछा दिया। लेकिन आज जब तमनार के ग्रामीण खदान से उजड़ने वाली अपनी ‘रियल लाइफ’ (Real Life) त्रासदी को बचाने की गुहार लगा रहे हैं, तो उन्हें ‘बाहरी’ बताकर बाउंसरों के धक्के खाने के लिए छोड़ दिया गया। हालांकि, रोबोट 2.0 में पक्षी और पर्यावरण की बड़ी-बड़ी बात करने वाले उस फिल्म एक्टर को भी दोबारा कभी तमनार की खदानों और यहां के उजड़ते पर्यावरण की याद नहीं आई!
खैर छोड़िए… याद तो पर्यावरण दिवस को प्रदूषण दिवस मनाने वाली रायगढ़ कांग्रेस को भी नहीं आई!

देखा जाए तो कल की जनसुनवाई का सार सिर्फ दो लाइनों का है..
‘तमनार की यह जनसुनवाई सिर्फ एक ‘रस्म अदायगी’ थी। जिस प्रोजेक्ट में SECL से ज्यादा अडानी का ‘इंटरेस्ट’ और उनके बाउंसरों की ‘दहशत’ दिखे, वहां पर्यावरण और आदिवासियों के अधिकारों की बात करना बेमानी है।‘



