रायगढ़। देश की महारत्न कंपनी एनटीपीसी लारा (NTPC Lara) एक बार फिर गंभीर विवादों के घेरे में है। बिजली उत्पादन के साथ-साथ यह पावर प्लांट अपने राखड़ सिंडिकेट को लेकर लगातार सुर्खियों में बना रहता है। कंपनी के कुछ अफसर, रसूखदार ट्रांसपोर्टर और सियासी पहुंच रखने वालों का यह गठबंधन उस बिल्ली जैसा है, जो आंख बंद करके दूध पीती है और समझती है कि उसे कोई देख नहीं रहा। इस ताजा सिंडिकेट फिलहाल बरमकेला सिंडिकेट के रूप में जाने आता है। जिसमें हरियाणा मूल के एक बड़े ट्रांसपोर्टर, कुछ भाजपा युवा नेता का नाम सामने आया है।
डमी डंपिंग
ताजा मामला रायगढ़ से झारखंड रांची के एड़ू एनएच के बीच फ्लाई ऐश डंपिंग के नाम पर चल रहे एक बड़े फर्जीवाड़े से जुड़ा है। पर्यावरण नियमों के मुताबिक थर्मल पावर प्लांट से 300 किलोमीटर के दायरे में फ्लाई ऐश का सुरक्षित निपटान करना अनिवार्य होता है। इस लंबी दूरी का पूरा ट्रांसपोर्टेशन खर्च खुद एनटीपीसी वहन करती है। दूरी जितनी लंबी होगी, ट्रांसपोर्टर का बिल भी उतना ही भारी बनेगा। इसी नियम की आड़ में सुनियोजित तरीके से एक बड़ा आर्थिक खेल खेला जा रहा है।
कायदे से फ्लाई ऐश से लदे भारी डंपरों को 300 किलोमीटर का सफर तय कर रांची पहुंचना चाहिए। मगर जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। राखड़ से भरी गाड़ियां प्लांट से निकलकर महज 40 से 50 किलोमीटर के दायरे में ही खाली कर दी जाती हैं। रायगढ़ के आसपास के खेतों में खुद से किए 20-40 फीट गड्ढों, सुनसान जगहों यह राखड़ अवैध रूप से डंप कर दी जाती है।
इस तरह निकाली हैं गई है सिस्टम की काट
अब सवाल उठता है कि कागजों में गाड़ियां रांची कैसे पहुंचती हैं? इसके लिए गाड़ियों की निगरानी वाले जीपीएस (GPS) सिस्टम की भी काट निकाल ली गई है। गाड़ी मालिकों को रायगढ़ लोकल डंपिंग एरिया का लोकेशन भी दिया जाता है। सभी जीपीएस डिवाइस को डंपर से निकाल लिया जाता है। फिर उसे किसी एक डंफर में रखकर रांची के रूट पर दौड़ा दिया जाता है, ताकि डिजिटल रिकॉर्ड में गाड़ी तय रास्ते पर चलती दिखे। रायगढ़ से रांची तक की फर्जी फास्ट ट्रैक की लिस्ट भी जमा होती है। डिलीवरी एंड पर गाड़ी, ड्राइवर और डंप साइट की फेक फोटो की सेटिंग का जिम्मा डंपिंग एरिया वाला संभालता है। इन सब के लिए एआई टेक्नोलॉजी का भी सहारा लिया जाता है। इस तरह सब कुछ सेट रहता है। कागजात पूरे होते ही एनटीपीसी से लाखों-करोड़ों के बिल बिना किसी अड़चन के क्लियर हो जाते हैं।
डिजिटल हेराफेरी में करोड़ों का मुनाफा
इस पूरे गोरखधंधे में मुनाफे का गणित बेहद चौंकाने वाला है। 300 किलोमीटर की दूरी का कागजी भाड़ा करीब 1200 से 1400 रुपये प्रति टन बनता है। जबकि स्थानीय स्तर पर 40-50 किलोमीटर में डंपिंग करने के लिए बड़े ट्रांसपोर्टर लोकल गाड़ी मालिकों की गाड़ी 400 से 500 रुपये प्रति टन के हिसाब से हायर करता है। बीच का 800 से 1000 रुपये प्रति टन का भारी मार्जिन सीधे सिंडिकेट की जेब में फुल प्रॉफिट बनकर जाता है।
आने वाली पीढ़ी भरेगी हरजाना
हर महीने करोड़ों रुपये के इस अवैध खेल की सबसे भारी कीमत रायगढ़ की जनता चुका रही है। फ्लाई ऐश में आर्सेनिक, लेड और कैडमियम जैसी बेहद जहरीली हेवी मेटल्स होती हैं। मनमाने ढंग से खेतों के कृत्रिम गड्ढों में फेंकी जा रही यह राख उपजाऊ जमीन को बंजर बना रही है। क्योंकि नियम अनुरूप उनपर मिट्टी की लेयरिंग नहीं की जाती हैं। बारिश के दिनों में यही जहर रिसकर सीधे ग्राउंड वाटर में मिल रहा है, जो आने वाले कुछ दशकों में गंभीर बीमारियों का सबब बनेगा ही।
अगर किसी निजी कंपनी के प्लांट में यह सब होता, तो बात अलग थी। लेकिन जब देश की सबसे बड़ी महारत्न सरकारी कंपनी में यह खेल खुलेआम चल रहा हो, तो दूसरों से क्या उम्मीद की जाए? क्या एनटीपीसी का इंटरनल ऑडिट और विजिलेंस सिस्टम वाकई इस खेल से अनजान है? अगर जीपीएस डेटा के साथ नेशनल हाईवे के टोल प्लाजा फुटेज की सही जांच हो जाए, तो इस पूरे नेक्सस की परतें खुलते देर नहीं लगेगी।









