रायगढ़। हिंदू पंचांग के अनुसार 10 अक्टूबर को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या और शनि अमावस्या का दुर्लभ संयोग बन रहा है। शनिवार के दिन अमावस्या तिथि पड़ने के कारण इसे शनिश्चरी अमावस्या भी कहा जाता है। इसी दिन 16 दिवसीय पितृ पक्ष का विधिवत समापन भी होगा। एक ही दिन पूर्वजों के तर्पण और कर्मफल दाता शनिदेव की आराधना का अवसर मिलने से इस तिथि का धार्मिक महत्व काफी बढ़ गया है।
तिथि का समय और श्राद्ध के मुहूर्त
पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर की रात करीब 9:35 बजे से प्रारंभ होकर 10 अक्टूबर की रात लगभग 9:19 बजे तक प्रभावी रहेगी। उदयातिथि और दिन के समय मौजूदगी के चलते श्राद्ध और तर्पण संबंधी सभी अनुष्ठान 10 अक्टूबर को ही संपन्न किए जाएंगे।
पितरों के श्राद्ध कर्म के लिए दिन का कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल विशेष माना जाता है। पंचांगीय गणना के अनुसार 10 अक्टूबर को कुतुप काल सुबह 11:13 से दोपहर 12:00 बजे तक, रौहिण काल 12:00 से 12:46 बजे तक और अपराह्न काल 12:46 से दोपहर 3:07 बजे तक रहेगा। स्थानीय पंचांग के आधार पर विभिन्न शहरों में समय में आंशिक अंतर संभव है।
सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या का महत्व और परंपराएं
सर्वपितृ अमावस्या को महालया अमावस्या और पितृ मोक्ष अमावस्या भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह उन सभी पूर्वजों के स्मरण और तर्पण का दिन है जिनकी मृत्यु तिथि परिवार को ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो सका था।
इस अवसर पर सुबह स्नान के बाद जल और तिल से तर्पण करने, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने का विधान है। इसके साथ ही ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को भोजन कराने, अन्न-वस्त्र का दान करने तथा गाय, कौवे और कुत्ते को भोजन अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है।
शनि अमावस्या पर पूजा और सामाजिक सेवा
शनिवार को अमावस्या पड़ने से श्रद्धालु शनि मंदिरों में तेल का दीपक जलाने, काले तिल अर्पित करने और पूजा-अर्चना की तैयारी में हैं। मान्यता के अनुसार शनिदेव न्याय और कर्म के देवता हैं, इसलिए इस दिन जरूरतमंदों की सहायता, गरीबों को दान और अच्छे कर्म करने पर विशेष बल दिया जाता है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार अमावस्या और पितृ कर्म के दिन घरों में शांत वातावरण बनाए रखने, विवादों से बचने और किसी भी प्रकार के नशे व तामसिक गतिविधियों से दूर रहने की सलाह दी जाती है।









