रायगढ़। रायगढ़ में उद्योगों के नाम पर विकास का बड़ा ढिंढोरा पीटा जाता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत इस चमकीले फरेब से एकदम उलट है। रायगढ़-खरसिया राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-49) पर बसा कुनकुनी गांव इसका जीता-जागता सुबूत है। यहां विकास नहीं, बल्कि कोयले की काली धूल और मौत का खौफ मंडरा रहा है… ना चिमनी न कोई धुआं, सिर्फ कोयला डंप होने भर से यहां के लोगों की सांसें छिनने लगी हैं।
“सड़क पर फैला कोयले का कीचड़ जैसे ही सूखता है, वह एक ‘ज़हरीली काली धुंध’ में बदल जाता है। भारी ट्रकों की रफ्तार से उठने वाली यह धुंध इतनी घनी होती है कि दिन के उजाले में भी सामने 5 मीटर दूर देखना नामुमकिन हो जाता है।”
हाईवे पर फैला कीचड़, मौत को सीधी दावत
वेदांत वाशरी एंड लॉजिस्टिक प्राइवेट लिमिटेड के भीतर एक रेलवे साइडिंग है। यहां दिन-रात बड़े पैमाने पर कोयला डंप किया जा रहा है। इसी कोयले की लोडिंग अनलोडिंग के लिए रोज़ाना सैकड़ों 18-चक्के वाले भारी ट्रेलर यहां दौड़ रहे हैं। प्लांट के अंदर कोई खास कंक्रीट इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है.. ज़मीन कच्ची और कही कही दलदली है। यह यह कोयल और मिट्टी से सना कीचड़ ट्रेलर डंफर के मोटे टायरों में चिपक कर सीधे हाईवे पर आ रहा है। नतीजतन, चमचमाती सड़क अब एक उबड़-खाबड़ और जानलेवा ट्रैक बन चुकी है।
दिन में घुप अंधेरा, सांसों में घुलता ज़हर
सड़क पर फैला यह कीचड़ सूखते ही एक खौफनाक मंज़र पैदा करता है। भारी वाहनों की रफ्तार से यह उड़ती हुई काली धूल में बदल जाता है। हाईवे पर धूल का ऐसा बवंडर उठता है कि दिन के उजाले में भी 5 मीटर दूर देखना नामुमकिन हो जाता है। आप सड़क किनारे खड़े हों, तो आंखें जलने लगती हैं। चंद मिनटों में चेहरे, बालों और कपड़ों पर कालिख की मोटी परत जम जाती है। नियम कहता है कि कंपनी को लगातार पानी का छिड़काव करना चाहिए। लेकिन ज़मीनी हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हो रहा और प्रबंधन आंखें मूंदे बैठा है। इस बारे में हमने ग्रामीणों से बात की तो उनका स्पष्ट कहना था की कंपनी द्वारा कभी भी सड़क पर पानी का छिड़काव नहीं किया जाता जबकि यह सब कुछ उसे कंपनी के वजह से ही होता है।
एक किलोमीटर का ‘ब्लाइंड ज़ोन’
यह पूरा प्लांट हाईवे के किनारे-किनारे करीब एक किलोमीटर तक फैला है। लेकिन इतनी भारी आवाजाही के बावजूद, यहां प्लांट द्वारा सड़क की तरफ एक लाइट भी नहीं लगाई गई है। रात होते ही यह पूरा इलाका घुप अंधेरे और उड़ती धूल के ‘ब्लाइंड ज़ोन’ में तब्दील हो जाता है। इस अंधेरे में टू-व्हीलर चलाना सीधे मौत के मुंह में जाने जैसा है। इस वाशरी के अपोजिट साइड में ही कुनकुनी गांव का में ही मुख्य द्वार है। स्थानीय लोगों ने बताया कि वह बहुत ही डरे सहमे इस सड़क को पार करते हैं, मजबूरी है जाना ही पड़ेगा! अब यह धूल और यह डर उनकी आम जिंदगी का हिस्सा है।
प्रकृति का हाल तो और भी बुरा है। सड़क किनारे पेड़ों की पत्तियां कोयले से काली हो चुकी हैं। हमारी टीम गई तो नेशनल हाईवे से थी लेकिन वहां का नजारा देखने के बाद हमारी टीम भी धूल के कारण खराब विजिबिलिटी और आंखों में जलन के कारण गांव के रास्ते से रायगढ़ वापस पहुंचे।
मंत्री जी के इलाके में यह हाल, तो बाकी प्रदेश का क्या?
इस पूरी तबाही के बीच रायगढ़ का पर्यावरण संरक्षण मंडल गहरी नींद में है। प्रशासन की यह खामोशी सबसे बड़े सवाल खड़े करती है। प्रदेश के पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी का गृह ग्राम बायांग यहां से बमुश्किल कुछ किलोमीटर दूर है। जब मंत्री जी के अपने इलाके की नाक के नीचे लोगों का दम घुट रहा है, तो पूरे सूबे से क्या उम्मीद की जाए? अभी तो प्लांट पूरे जोर से चालू भी नहीं हुआ है।
ऐसा नहीं है कि यह अभी-अभी की बात है, सालों से स्थानीय निवासी और इस सड़क से गुजरने वाले लोग इस काली डस्ट के धुंध का दंश झेल रहे हैं। शिकायतें भी हुई, खबरें मीडिया में भी आई, मगर यह रायगढ़ है और यहां सब मैनेज हो जाता है! फिलहाल ‘साँच को आंच क्या..?’ जो भी इस रास्ते से गुजारा होगा, खास करके दुपहिया वाहनों में तो उसने यह नरक जरूर झेला होगा!








