केंद्र सरकार जल्द ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) को खत्म करके एक नया कानून लाने की तैयारी में है। प्रस्तावित नया कानून — “विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)” (VB-G RAM G) — मनरेगा की जगह लेगा। लोकसभा सदस्यों के बीच सोमवार को इस विधेयक की प्रति बांटी गई है।
बिल के अनुसार, नया कानून ग्रामीण परिवारों को मौजूदा 100 दिनों के बजाय 125 दिनों के वेतन रोजगार की कानूनी गारंटी देगा। सरकार का दावा है कि यह कदम “विकसित भारत @2047 के राष्ट्रीय विज़न” के अनुरूप ग्रामीण विकास ढांचे को सशक्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।
नए कानून के तहत संरचना
बिल की कॉपी के अनुसार, केंद्र सरकार एक सेंट्रल ग्रामीण रोजगार गारंटी काउंसिल गठित करेगी।
इस काउंसिल में—
- एक चेयरपर्सन,
- केंद्र और राज्य सरकारों के प्रतिनिधि,
- पंचायती राज संस्थानों व मजदूर संगठनों के सदस्य,
- समाज के कमजोर वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले 15 से अधिक गैर-सरकारी सदस्य
- और भारत सरकार के जॉइंट सेक्रेटरी स्तर से नीचे का एक मेंबर-सेक्रेटरी शामिल होगा।
यह नया ढांचा मनरेगा से अधिक खर्च और व्यापक निगरानी प्रणाली की संभावना को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
प्रियंका गांधी ने उठाए सवाल
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने सरकार पर मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम हटाने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा,
“वे महात्मा गांधी का नाम क्यों हटा रहे हैं? महात्मा गांधी इस देश और इतिहास के सबसे महान नेताओं में से एक थे। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों किया जा रहा है।”
क्या है मनरेगा?
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) 2005 में तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा शुरू किया गया था। इसका मकसद ग्रामीण परिवारों को हर साल कम से कम 100 दिन की अनस्किल्ड मजदूरी वाली नौकरी की कानूनी गारंटी देना था।
2009 में इसका नाम “NREGA” से बदलकर “MGNREGA” कर दिया गया।
वर्तमान में देशभर में इस स्कीम से 15.4 करोड़ से अधिक सक्रिय मजदूर जुड़े हैं। इस कानून के तहत 15 दिनों के भीतर काम देने या बेरोजगारी भत्ता देने की कानूनी बाध्यता है, जबकि कम से कम एक-तिहाई लाभार्थी महिलाएं होनी जरूरी हैं।
मनरेगा को दुनिया का सबसे बड़ा रोजगार गारंटी कार्यक्रम माना जाता है, जिसने ग्रामीण आजीविका सुरक्षा और पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका को मजबूत किया।



