रायगढ़। आप वही देखेंगे और सुनेंगे जो वो चाहेंगे। डिजिटल प्लेटफॉर्म को नियंत्रित करने की पूरी योजना तैयार है। दिल्ली और पटना में जेन जी के आंदोलन के बाद राजनीतिक दल तो आनन फानन में डिजिटल मीडिया खासकर रील्स को लेकर अति सतर्क हो गई है। पर सतर्कता और मेहरबानी में वह फर्क नहीं समझ पा रही। जब एआई जमाने में सत्यता और प्रामाणिकता बड़ा चैलेंज है ऐसे में रीलबाजों को प्रमोट करके सरकार क्या संदेश देना चाहती है।
सोशल मीडिया के उथले समंदर में व्यूज की मछली पकड़ने वालों के दिन फिर गए हैं। जिन्हें कल तक रीलबाज कहकर हंसा जाता था, आज वे कंटेंट क्रिएटर के कुलीन वर्ग में शामिल हो गए हैं। नाम बदलना बुरा नहीं है, लेकिन चिंता तब शुरू होती है जब इस नए नाम के साथ सरकारी पहचान, मंच, सुविधाएं और करदाताओं के पैसे से जुटे संसाधन जुड़ने लगते हैं। रायगढ़ में कंटेंट क्रिएटर्स के लिए ₹2 करोड़ के हाई-टेक स्टूडियो की घोषणा इसी विडंबनापूर्ण बदलाव का जीवंत उदाहरण है।
सरकारी खजाने से करोड़ों लुटाने से पहले एक बुनियादी सवाल हवा में तैर रहा है इन क्रिएटर्स की प्रामाणिकता, मौलिकता और जवाबदेही का पैमाना क्या होगा?
सबसे बड़ा सवाल उस कसौटी पर है, जिसके आधार पर किसी को ‘क्रिएटर’ मानकर सरकारी संरक्षण दिया जा रहा है। क्या सिर्फ फॉलोअर्स की संख्या और किसी रील का वायरल होना उसकी मौलिकता या तथ्यात्मक विश्वसनीयता का प्रमाण हो सकता है? अक्सर देखा जाता है कि सोशल मीडिया पर ‘उटपटांग हरकतें’ या कुछ ‘विचित्र’ करके आसानी से व्यूज बटोर लिए जाते हैं। क्या ऐसे सतही कंटेंट को सरकार ‘कंटेंट क्रिएटर’ की श्रेणी में रखकर प्रमोट करना चाहती है? यदि रायगढ़ में सरकारी संसाधनों का उपयोग होना है, तो क्रिएटर्स के चयन की कसौटी सार्वजनिक क्यों नहीं है?
रोचक बात यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार की अपनी क्रिएटर एंड इंफ्लूएंसर अवार्ड्स व्यवस्था में मौलिकता, रचनात्मकता , प्रामाणिकता और सत्यापन जैसे कड़े मानदंड रखे गए हैं। यानी सरकार स्वयं मानती है कि केवल लोकप्रियता पर्याप्त नहीं है। फिर रायगढ़ के स्टूडियो के मामले में इन मानदंडों को ताक पर क्यों रखा जा रहा है?
दिल्ली दौरा: चयन प्रक्रिया पर अपनों के ही सवाल
हाल ही में छत्तीसगढ़ के डिजिटल क्रिएटर्स के एक जत्थे को सरकारी खर्च पर दिल्ली दौरे पर ले जाया गया। वहां उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से मुलाकात की। मकसद बताया गया कि ये क्रिएटर्स दिल्ली के बदलाव की कहानी को अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए जनता तक पहुंचाएंगे।
लेकिन, इस हनीमून पीरियड के बीच ही क्रिएटर समुदाय के भीतर से असंतोष की रीलें सामने आने लगीं। सवाल चयन प्रक्रिया और पारदर्शिता पर थे। जिन्हें सरकार डिजिटल आवाज मानकर प्रमोट कर रही है, उनके बीच ही चयन को लेकर आम सहमति नहीं है।
यह घटना एक गंभीर चेतावनी है। जब सरकार डिजिटल चेहरों को अपने संचार तंत्र का हिस्सा बनाती है, तो चयन पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए। किसे बुलाया गया, किस आधार पर बुलाया गया और योग्य होने के बावजूद कौन छूट गया। इन सवालों के जवाब जनता के सामने होने चाहिए।
रील से एआई तक: डिजिटल कार्यकर्ता और प्रोपेगेंडा का खतरा
सरकार की इस अति-सक्रियता के पीछे की राजनीति को समझना मुश्किल नहीं है। दिल्ली और पटना में जेन जी के हालिया आंदोलनों ने राजनीतिक दलों को हिलाकर रख दिया है। अब वे डिजिटल मीडिया, खासकर रील्स को लेकर अति-सतर्क हैं। लेकिन समस्या यह है कि सरकार ‘सतर्कता’ और ‘मेहरबानी’ के बीच का फर्क नहीं समझ पा रही है।
आने वाले समय में वीडियो सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि धारणा बनाएंगे। यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब राजनीति में एआई का प्रवेश हो चुका है। उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनाव से पहले भाजपा और सपा के बीच एआई द्वारा बनाए वीडियो को लेकर जारी तलवारखिंचनी इसका प्रमाण है। अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ को निशाना बनाने वाले आपत्तिजनक एआई कंटेंट सामने आए हैं, हालांकि दोनों दलों ने इनसे पल्ला झाड़ लिया है। ऐसे खतरनाक दौर में, जहां वास्तविक और कृत्रिम के बीच फर्क करना मुश्किल है, सरकार बिना किसी सत्यापन तंत्र के रीलबाजों को प्रमोट करके क्या संदेश देना चाहती है?
बड़ा सवाल यह है कि कल जब इन्हीं कंटेंट क्रिएटर्स के जरिए सरकारी योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाई जाएगी, तो उसकी सत्यता कौन जांचेगा? अगर गलत जानकारी प्रसारित होती है, तो जवाबदेही किसकी होगी? क्या ये क्रिएटर सिर्फ सरकार के डिजिटल कार्यकर्ता बनकर रह जाएंगे? और सबसे अहम क्या सरकार की आलोचना करने वाला क्रिएटर भी उसी ₹2 करोड़ के स्टूडियो और सुविधाओं का इस्तेमाल कर पाएगा?
पत्रकारिता बनाम प्रचार: धुंधली होती रेखा
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारिता सिर्फ इसलिए अप्रासंगिक नहीं हो जाता कि अब हर मोबाइल कैमरा एक संभावित मीडिया प्लेटफॉर्म है। पत्रकारिता में स्रोत, तथ्य-जांच, जवाबदेही और संपादकीय उत्तरदायित्व जैसी स्थापित कसौटियां हैं। कंटेंट क्रिएटर के लिए ऐसी कोई आचार संहिता नहीं है। ऐसे में, यदि बिना किसी मापदंड के उन्हें सरकारी तंत्र में शामिल किया जाता है, तो एकसरकारी सूचना और सरकारी प्रचार के बीच की रेखा पूरी तरह धुंधली हो जाएगी।
सरकार का डिजिटल माध्यमों की ओर जाना समय की जरूरत हो सकता है। युवाओं को तकनीक और संसाधन देना भी सराहनीय है। लेकिन रीलबाज को सिर्फ नया नाम देकर कंटेंट क्रिएटर बना देना पर्याप्त नहीं है। पहचान के साथ सख्त पैमाना भी चाहिए। कंटेंट क्रिएटर कौन है? उसकी मौलिकता क्या है, उसकी विश्वसनीयता कैसे साबित होगी और उसकी गलती की जवाबदारी कौन लेगा। ₹2 करोड़ का स्टूडियो चालू होने से पहले सरकार को इन सवालों के ठोस और सार्वजनिक जवाब देने होंगे। वरना खतरा यह नहीं कि रीलें ज्यादा बनेंगी; खतरा यह है कि जनता व्यूज को विश्वसनीयता और प्रचार को पत्रकारिता समझने की भूल कर बैठेगी।








