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50 साल का परिवारवाद खा गया रायगढ़ कांग्रेस को.. तीसरे मोर्चे की आहट और डॉक्टर राजू का इस्तीफा!

रायगढ़। 1 नवंबर छत्तीसगढ़ गठन की 25 वी सालगिरह के दिन डॉ राजू अग्रवाल ने रायगढ़ कांग्रेस से किनारा कर लिया। उन्होंने अपना त्यागपत्र रायगढ़ कांग्रेस जिला अध्यक्ष अनिल शुक्ला को दे दिया। अपने त्यागपत्र में उन्होंने बताया कि वे कांग्रेस की नीतियों से प्रभावित हैं मगर अब वह अपना समय समाज सेवा में देना चाहते हैं। जिसके लिए वह कांग्रेस छोड़ रहे हैं। उनकी इस्तीफे की यह वजह किसी के गले नहीं उतर रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस के बड़े नेताओ की अपेक्षा और रायगढ़ कांग्रेस की सिंगल रूल पॉलिटिक्स इसकी बड़ी वजह है।

गद्दी की बादशाहत

कांग्रेस में अपना जीवन खपा देने वाले और राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उनके इस्तीफे से एक भारी नुकसान कांग्रेस को हुआ है और एक बार फिर से तीसरे मोर्चे का उदय हो सकता है। कांग्रेस के पिछले 50 साल का इतिहास उठाकर देखा जाए तो यहां सिर्फ दो परिवारों का ही एक छत्र राज चला, कांग्रेस संगठन भी उनके इर्द-गिर्द सेवा में लगा रहा। 25 सालों तक पूर्व विधायक कृष्ण कुमार गुप्ता और उनके परिवार एक छत्रराज चला। उनके समय स्थिति यह थी कि कांग्रेस कार्यालय से ज्यादा पावर और राजनीति उनकी गद्दी से संचालित होती थी। जिला अध्यक्ष भी उनकी पसंद का ही होता था।

नायक परिवार का आगमन

वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में कृष्ण कुमार गुप्ता चुनाव हारे और इसके साथ ही रायगढ़ राजनीति से भी अचानक से विलुप्त हो गए। गद्दी भी लगभग गायब हो गई। कांग्रेस में लगभग राजनीतिक शून्यता आ गई थी। इसी बीच पदार्पण हुआ भाजपा से कांग्रेस ज्वाइन कर मंत्री बने डॉक्टर शक्राजित नायक का। 2008 में भी रायगढ़ विधानसभा से कांग्रेस की सीट से लड़े और विधायक चुने गए। रायगढ़ कांग्रेस की पूरी राजनीति अब नायक परिवार के इर्द गिर्द घूमने शुरू हो गई। फिर वही दौर शुरू हुआ। संगठन पर भी उनके चहेतो का कब्जा रहा और विधायकी की विरासत उनके पुत्र की। इस कल में संगठन पहले की तरह विधायकी के हाथों कठपुतली भर रहा। यही वजह है कोई दूसरा बड़ा नेता पनप नहीं पाया।

छले गए डॉ राजू

देखा जाए तो डॉक्टर राजू के साथ इसी प्रकार की स्थिति निर्मित की गई। क्योंकि डॉक्टर राजू पिछले दो चुनाव से कांग्रेस के विधायक के प्रबल दावेदार के रूप में जाने गए। भले ही उनका पदार्पण कांग्रेस के  कद्दावर दिग्विजय सिंह और चरणदास महंत और टी एस सिंहदेव के समक्ष रायगढ़ कांग्रेस के पावर हाउस कहे जाने वाले खरसिया के मंच से हुआ था। उस समय चर्चा जोरों पर थी कि उनका टिकट लगभग फाइनल है मगर नायक परिवार का पुराना राजनीति ताल्लुकात काम आया और ऐन वक्त पर उनकी टिकट कट गई और प्रकाश नायक का नाम लिस्ट में आ गया। जानकार बताते हैं की प्रकाश नायक को टिकिट दिलाने में चरणदास महंत और टी एस सिंह देव की बड़ी भूमिका थी।

जीत के बाद करारी हार

2018 विधानसभा चुनाव में प्रकाश नायक का चुनाव जीतना भी एक संयोग था। क्योंकि भाजपा की टिकट से वर्तमान विधायक रोशन लाल अग्रवाल लड़ रहे थे, दूसरी तरफ भाजपा के पूर्व विधायक विजय अग्रवाल निर्दलीय मैदान में कूदे। भाजपा के आपसी द्वंद का, प्रकाश नायक को तगड़ा फायदा हुआ और वे चुनाव जीत गए जिसे जनता ने “एक्सीडेंटल विधायक” का दर्जा दिया। मगर जब अगली बार 2023 बीजेपी एकजुट हुई। तब वह ऐतिहासिक 65000 मतों से हारे। इस हार ने कांग्रेस की कमर तोड़ दी और मठाधीशों के दावे फेल!

तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट

राजनीतिक जानकार बताते हैं कि कि पिछले 50 सालों में रायगढ़ कांग्रेस में जो परिवारवाद की स्थितियां निर्मित हुई, उसने कांग्रेस के सच्चे कार्यकर्ताओं मनोबल तोड़ दिया है। युवा वर्ग कांग्रेस से मुंह मोड़ रहा है। पुराने छोड़कर जा रहे है। मगर जो राजनीति में रुचि रखते है, वह राजनीति तो करेंगे ही और ऐसे तीसरा मोर्चा का बीज आने वाले समय में एक पेड़ बनकर दिखाई देगा। इतिहास दोहरा भी सकता है अपने आप को.. क्योंकि आजादी के बाद रायगढ़ में तीसरे मोर्चे ने 1972 तक अपना वर्चस्व कायम रखा था। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जननायक रामकुमार अग्रवाल दो बार विधायक रहे और फिर बाद में कांग्रेस ज्वाइन किया। आपको बता दें कि डॉ राजू उन्हीं के पुत्र हैं।

अगला अंक

जरा ठहरो तो.. तीसरा मोर्चा, किसी वट वृक्ष की छांव में लगातार बैठकें कर रहा है…

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