रायगढ़। दिल्ली में इन दिनों चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लग रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अगुवाई में ‘वोटों की चोरी’ हो रही है। कहा जा रहा है कि वोटर लिस्ट से नाम काटकर चुनाव के नतीजे बदले जा रहे हैं। दिल्ली का यह शोर सुनकर शायद आपको लगे कि यह सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी है। लेकिन ‘RIG24’ की यह खास रिपोर्ट आपको बताएगी कि रायगढ़ जिले में जो हुआ है, वह कितना हैरान करने वाला है।
हाल ही में वोटर लिस्ट को अपडेट करने का काम हुआ है, जिसे एसआईआर (SIR) कहते हैं। इस दौरान रायगढ़ जिले की चार सीटों से कुल 71,974 वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं। पहले जिले में 9,14,669 वोटर थे, जो अब घटकर 8,42,695 ही रह गए हैं। अधिकारी इसे एक रूटीन काम बता रहे हैं। जिसमें मृत या शहर छोड़ चुके लोगों के नाम काटे जाते हैं। लेकिन अगर हम पिछले दो चुनावों के नतीजों को देखें, तो यह मामला इतना सीधा नहीं लगता।

लैलूंगा
सबसे पहले बात करते हैं आदिवासी सीट लैलूंगा की। साल 2018 में कांग्रेस से (चकधर सिदार) जीतने वाले को 24 हजार वोटों की भारी बढ़त मिली थी। लेकिन 2023 के चुनाव में कांग्रेस की विद्यावती के लिए यह जीत का अंतर सिकुड़कर सिर्फ 4,176 वोट रह गया। अब नई लिस्ट में लैलूंगा से 12,659 नाम काट दिए गए हैं। सोचिए, जहां जीत-हार सिर्फ 4 हजार वोटों से तय हुई हो, वहां साढ़े 12 हजार नाम कट जाना जो पिछले जीत के अंतर से तीन गुना अधिक है… कितना बड़ा उलटफेर कर सकता है।
धरमजयगढ़
कुछ ऐसा ही हाल धरमजयगढ़ का भी है। साल 2018 में कांग्रेस को यहां 40 हजार वोटों के बड़े अंतर से जीत मिली थी। लेकिन 2023 आते-आते यह फासला घटकर केवल 9,637 वोट रह गया। अब इस सीट से 12,171 वोटरों को लिस्ट से बाहर कर दिया गया है। यानी यहां भी काटे गए वोटों की संख्या, मौजूदा विधायक की जीत के अंतर से काफी ज्यादा है।
जिले की दो आदिवासी आरक्षित सीटों, लैलूंगा और धरमजयगढ़.. जिसपर कांग्रेस का दबदबा है, दोनों ही सीटों पर काटे गए वोटों की संख्या मौजूदा विधायकों की जीत के अंतर से कहीं ज्यादा है, जिसका सीधा अर्थ है कि अगली बार चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा, यह काफी हद तक इस मतदाता सूची के शुद्धिकरण ने अभी से तय कर दिया है।
खरसिया
अब चलते हैं जिले की हाई-प्रोफाइल सीट खरसिया की तरफ। यह सीट हमेशा से एक मजबूत गढ़ रही है। यहां पिछले 40 साल से कांग्रेस के पटेल परिवार का दबदबा रहा है। पहले स्वर्गीय नंद कुमार पटेल विधायक थे, अब उनके पुत्र उमेश पटेल ये विरासत थामे हैं। साल 2018 में यहां जीत का अंतर 16 हजार था, जो 2023 में बढ़कर 21 हजार के पार चला गया। इसके बावजूद, खरसिया से 14,066 वोटरों के नाम हटाए गए हैं। पिछले दो चुनाव के जीत हार के अंतर का एवरेज निकल जाए 18 हजार वोट के करीब यह आंकड़ा बैठता है। ऐसे में 14 हजार वोटरों के नाम हटाए जाने के बाद यहां का सियासी गेम बिगाड़ सकता है और कहा जा सकता है कि कांग्रेस अपने सबसे सुरक्षित गढ़ में भी अब उतनी सुरक्षित नहीं रही।
रायगढ़
सबसे ज्यादा चौंकाने वाले आंकड़े जिला मुख्यालय रायगढ़ विधानसभा सीट के हैं। साल 2018 में यहां जीत-हार का अंतर करीब साढ़े चौदह हजार था। लेकिन 2023 में यह अंतर छलांग लगाकर 64 हजार के पार पहुंच गया। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, अकेले रायगढ़ सीट से सबसे ज्यादा 33,078 नाम काटे गए हैं। एक ही शहर से 33 हजार वोटरों का गायब होना किसी बड़े बदलाव का साफ इशारा है।
देखा जाए रायगढ़ विधानसभा की राजनीति भी बड़ी दिलचस्प है। छत्तीसगढ़ गठन के बाद से यहां कोई भी पार्टी या विधायक लगातार दूसरी बार अपनी सीट नहीं बचा पाया। 2018 में कांग्रेस के प्रकाश नायक ने भाजपा के रोशनलाल को 14,580 मतों से हराया था (जबकि निर्दलीय विजय अग्रवाल ने 42 हजार से ज्यादा वोट काटे थे)।
2023 में बदलाव हुआ। भाजपा के ओ.पी. चौधरी ने पूरे समीकरण को पलटते हुए 64,443 मतों के प्रचंड अंतर से सीट जीती।
रायगढ़ में SIR का असर की बात करे तो अकेले रायगढ़ विधानसभा से 33,078 वोट काटे गए हैं। यह संख्या 2018 में कांग्रेस द्वारा हासिल की गई जीत के मार्जिन से दोगुनी से भी ज्यादा है। एक आंकड़ा और भी है जिसमें यह बताता है कि छत्तीसगढ़ गठन के बाद से यहां जीत का अंतर किसी भी पार्टी के लिए औसतन 20 से 30 हजार के बीच रहा है। ऐसे में कटे हुए 33 हजार वोट चुनाव में नए सिरे से किसी पार्टी विशेष के लिए ध्रुवीकरण तय कर सकती है।
इससे किसको फायदा..?
SIR प्रक्रिया के बाद राज्यों में होने वाले चुनाव को देखा जाए तो उसका सबसे बड़ा नुकसान मौजूदा विधायकों और सरकार को ही होता है। पश्चिम बंगाल और बिहार के चुनाव परिणाम सबसे ज्यादा आरोप और विवाद में रहे है। दोनों ही राज्यों में केंद्र की सत्ता पर बैठी भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में भाजपा का ही दबदबा रहा है। राज्य गठन के बाद अभी तक हुए विधानसभा चुनाव में चार बार भारतीय जनता पार्टी ने शासन किया है और एक बार कांग्रेस ने। लेकिन राज्य में कांग्रेस की कुछ सीटे हैं जो उसकी गढ़ मानी जाती है, रायगढ़ जिले की ये सीटे भी उन सीटों में से ही एक है, जहां भाजपा काफी कमजोर है। नई वोटिंग लिस्ट के के आंकड़े बताते हैं कि परिवर्तन की संभावना प्रबल है!









