नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ की अनूठी लोक-संस्कृति और सामाजिक इतिहास पर केंद्रित वृत्तचित्र ‘राम-नामी’ को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में गैर-फीचर श्रेणी के तहत सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस उपलब्धि के लिए फिल्म के निर्देशक भारतबाला गणपति को रजत कमल पुरस्कार से सम्मानित किया।
प्रख्यात फिल्मकार भारतबाला गणपति द्वारा निर्देशित और ‘वर्चुअल भारत’ प्रोडक्शन के तहत निर्मित यह लघु वृत्तचित्र छत्तीसगढ़ के महानदी तटवर्ती इलाकों में बसे रामनामी संप्रदाय की जीवनशैली, अटूट आस्था और उनके अहिंसक सामाजिक प्रतिरोध को उजागर करता है।
भेदभाव के खिलाफ शांतिपूर्ण भक्ति की अनूठी मिसाल
यह डॉक्यूमेंट्री रामनामी समुदाय के उस ऐतिहासिक संघर्ष को सामने लाती है, जिसकी शुरुआत 19वीं सदी के उत्तरार्ध में हुई थी। तत्कालीन दौर में सामाजिक भेदभाव और मंदिरों में प्रवेश की मनाही के विरोध में इस समुदाय ने किसी टकराव के बजाय भक्ति का एक शांतिपूर्ण रास्ता चुना। ईश्वर पर प्रत्येक मनुष्य का समान अधिकार सिद्ध करने के लिए समुदाय के लोगों ने अपने पूरे शरीर, वस्त्रों और घरों पर ‘राम’ नाम अंकित करवाना शुरू किया।
समय के साथ पूरे शरीर पर गोदना, ‘राम-राम’ लिखी विशेष ओढ़नी और मोरपंखों का मुकुट (खांप) इस समुदाय की विशिष्ट पहचान बन गए। समुदाय के लिए यह केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और न्याय की मुखर अभिव्यक्ति भी है।
मुख्यमंत्री बोले; गौरवशालीक्षण
बदलते वक्त के साथ युवा पीढ़ी में पूरे शरीर पर गोदना कराने की इस कठिन परंपरा में कमी देखी जा रही है। ऐसे में इस वृत्तचित्र को इस ऐतिहासिक विरासत के दृश्य अभिलेखीकरण और संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
डॉक्यूमेंट्री को राष्ट्रीय सम्मान मिलने पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इसे पूरे प्रदेश के लिए गौरवशाली क्षण बताया। उन्होंने कहा कि रामनामी समाज के शरीर पर गुदा ‘राम’ केवल अक्षर नहीं, बल्कि पीढ़ियों की साधना और समर्पण की पहचान है। वहीं निर्देशक भारतबाला गणपति ने यह पुरस्कार रामनामी समुदाय के अटूट विश्वास, धैर्य और अपनी टीम को समर्पित किया है।









