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गजब रायगढ़! बिना पर्यावरण स्वीकृति  दो साल से चल रहा रायगढ़ इस्पात! पर्यावरण विभाग और पूरे एडमिनिस्ट्रेशन सिस्टम का खुला संरक्षण!!

रायगढ़। कहते हैं जब बाड ही खेत खाने लगे तो खेत का तो भगवान भी नहीं बचा सकता। कुछ ऐसा ही हाल छत्तीसगढ़ के पर्यावरण का है। कहने को छत्तीसगढ़ में पर्यावरण की सुरक्षा करने भारी भरकम पर्यावरण सरंक्षण मंडल है लेकिन इसका काम सरंक्षण की बजाय भक्षण करना ही प्रतीत होता है।

नियमों के अनुसार पर्यावरण स्वीकृति स्वयं ही रद्द हो जानी थी

ऐसा ही एक ताजा मामला है रायगढ़ के देलारी सराईपाली स्थित रायगढ़ इस्पात एंड पावर लिमिटेड का ! सन २००५ में इस प्लांट की स्थपाना हुई। २०१० में वृहद् विस्तार के लिये केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से स्वीकृति मिल गई। विस्तार का कार्य पूरा नहीं होने के कारण पहले २०१५ में फिर २०१७ में स्वीकृति की मियाद अंततः २०२० तक बढ़वा ली गई| मतलब यदि २०२० तक उत्पादन शुरू नहीं होता तो पर्यावरणीय स्वीकृति स्वयं निरस्त हो जाती।  लेकिन ऐसा नहीं हुआ।  

बिना स्वीकृति के 2 साल से हो रहा उत्पादन

प्लांट के भीतर का दृश्य

तब से लेकर आज तक लगभग दो वर्षों से रोलिंग मिल में उत्पादन बेरोकटोक निर्बाध –गति से चल रहा है। जब ऊपर तक सेटिंग और राजनैतिक रसूख हो तो काम रुकने का तो सवाल ही नहीं है। रही बात रोलिंग मिल में उत्पादन की सपूत की तो नीचे वीडियो में आप देख सकते हैं।

 

सोची समझी षड्यंत्र का हिस्सा जनसुनवाई

अभी जो २० मार्च को जनसुनवाई नियत की गई है वो सोंचे समझे षड्यंत्र का ही हिस्सा हैं। जन सुनवाई के बाद केंद्र सरकार से फ्रेश स्वीकृति प्राप्त कर वर्षों से चल रहे अवैधानिक प्लांट को वैधानिक दर्जा मिल जायेगा। मामला फाइलों में बंद और उद्योग व् पर्यावरण विभाग दोनों की बल्ले बल्ले ! 

ई.आई. ऐ. २००६ के अनुसार केंद्र से स्वीकृति पश्चात् ही उद्योग की स्थापना व् उत्पादन शुरू किया जा सकता है।  पर्यावरण सरंक्षण अधिनियम 1986, एयर एक्ट १९८१ एवं वाटर एक्ट १९७४ के तहत ऐसे मामलों में पर्यावरण विभाग कोर्ट में उद्योग के विरुद्ध अपराधिक मामला दर्ज करवाता है जिसमे सजा का प्रावधान है। 

प्लांट में चालू है काम

शिकायत होने के बाद भी कोई एक्शन नहीं

इस बारे में जन चेतना मंच के रमेश अग्रवाल ने बताया कि इस संगीन अपराध की जानकारी मैंने जिला कलेक्टर, मुख्य सचिव व् केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय तक कर दी है लेकिन यदि कुछ नहीं होता है तो सिवाय हाई कोर्ट या एनजीटी जाने के कोई विकल्प नहीं बचता।

रमेश अग्रवाल जन्म चेतना मंच

नपेंगे आला अफसर भी

लेकिन मामला यंहा पेचीदा हैं।  इस मामले में दोषी तो उद्योग के साथ साथ विभाग के आला अधिकारी भी माने जायेंगे| उद्योग के खिलाफ तो फिर भी पर्यावरण विभाग कोर्ट जाकर अपनी खाल बचाने की कोशिश कर सकता है लेकिन सदस्य सचिव जैसे ऊँचे ओहदे पर तैनात कमाऊ अधिकारी  पर कौन कार्यवाही करेगा  !!

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