नमस्कार रायगढ़! जरा सोचिए, आप एक ऐसे भव्य आयोजन में बैठे हैं जो पूरी दुनिया में अपने शास्त्रीय संगीत, कथक और सुर-ताल की पवित्रता के लिए जाना जाता है। आप उम्मीद कर रहे हैं कि पखावज की थाप गूंजेगी, राग-रागिनियां सजेंगी, लेकिन अचानक मंच से भारी आवाज आती है- ‘बीड़ी जलाई ले, जिगर से पिया’… और उसके ठीक बाद ‘जुम्मा-चुम्मा दे दे’।
कैसा लगेगा आपको? यकीन मानिए, यही वाकया हमारे रायगढ़ के गौरव, 41वें अंतरराष्ट्रीय चक्रधर समारोह में घटा है। प्रशासन की इस ‘शानदार’ कला-पारखी नजर ने समारोह को जैसे किसी शादी का डीजे या सस्ता ऑर्केस्ट्रा बनाकर रख दिया है।
शास्त्रीय मंच पर बॉलीवुड का फूहड़ तड़का
रामलीला मैदान में सजे इस ऐतिहासिक मंच पर सातवीं सांस्कृतिक संध्या का दिन था। प्रशासन ने बड़े चाव से इंडियन आइडल फेम गायक अमित सना को बुलाया था। लेकिन अमित सना ने रायगढ़ घराने के इस पवित्र मंच से ऐसे फूहड़ और द्विअर्थी बॉलीवुडिया गानों की झड़ी लगा दी, जिसने वहां बैठे हर सच्चे कला प्रेमी को भीतर तक आहत कर दिया।
राजपरिवार का फूटा गुस्सा: सांसद ने बीच में छोड़ा कार्यक्रम
अब जरा सोचिए, जिनके दादा के नाम पर यह पूरा जलसा होता है, उन पर क्या बीती होगी! दर्शक दीर्घा में बैठे संगीत सम्राट राजा चक्रधर सिंह के पोते और भाजपा के राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह यह तमाशा देखकर इतने नाराज हुए कि कार्यक्रम को बीच में ही छोड़कर बाहर निकल गए।

उन्होंने सीधे तौर पर आयोजकों को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा,
“इस समारोह के मंच से ऐसा फूहड़ गाना चक्रधर समारोह का अपमान तो है ही, साथ ही मेरे दादा संगीत सम्राट चक्रधर की आत्मा को भी इससे गंभीर ठेस लगी है।”
सांसद जी का गुस्सा यहीं शांत नहीं हुआ; उन्होंने साफ कह दिया कि समारोह की गरिमा शुरू से ही तार-तार हो रही है और वे इस पूरी बदइंतजामी की लिखित शिकायत मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और संस्कृति मंत्री से करेंगे।

उर्वशी देवी सिंह का बड़ा खुलासा: समिति को किनारे कर अफसरों ने चुनी अपनी ‘प्लेलिस्ट’
आप सोच रहे होंगे कि रायगढ़ जैसे कला-संपन्न शहर में ऐसे गानों को पास किसने किया? इस राज से पर्दा उठाया है राजपरिवार की ही सदस्या और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सुश्री उर्वशी देवी सिंह ने। उनका खुलासा सुनकर आप भी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर हंसेंगे भी और रोएंगे भी।
उर्वशी जी ने बताया कि इन प्रस्तुतियों का चयन समारोह की ‘कलाकार चयन समिति’ ने किया ही नहीं था! जी हां, कला मर्मज्ञों की समिति को दरकिनार कर जिला प्रशासन ने खुद ही यह निर्णय ले लिया था। उन्होंने प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए स्पष्ट कहा,
“समारोह की अपनी विशिष्ट गरिमा और सांस्कृतिक पहचान है। चक्रधर समारोह जैसे प्रतिष्ठित आयोजन में कलाकारों का चयन पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। यदि समिति की अनुशंसा के बिना किसी कलाकार को मुख्य मंच पर स्थान दिया जाता है, तो यह आयोजन की निर्धारित प्रक्रिया और गरिमा दोनों के खिलाफ है।”
उन्होंने यह भी नसीहत दी कि केवल सस्ती लोकप्रियता और भीड़ जुटाने के लिए समारोह की सांस्कृतिक प्रासंगिकता और मूल भावना से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए।

हड़बड़ी ऐसी कि राज्यपाल से पहले ही हो गई गणेश वंदना
प्रशासन की लापरवाही का आलम गानों तक सीमित नहीं रहा। बताया जा रहा है कि मुख्य अतिथि (राज्यपाल) के आने का भी इंतजार नहीं किया गया; उनके पहुंचने से पहले ही हड़बड़ी में गणेश वंदना निपटा दी गई और दीप प्रज्वलन भी बस एक खानापूर्ति बनकर रह गया।
सोशल मीडिया पर तो जनता ने इस पूरी व्यवस्था की जमकर क्लास लगा दी है। लोग तंज कस रहे हैं कि “वाह! चक्रधर समारोह में जुम्मा-चुम्मा और बीड़ी जलाई ले जैसी ‘शानदार शास्त्रीय प्रस्तुति’ हुई!” एक यूजर ने तो यहां तक लिख दिया कि जिस मंच को अपनी मौलिकता के लिए जाना जाता था, वहां ऐसे नकली गायकों को क्यों सुना जाए।
गणेश कुशवाहा ने भी दी नसीहत
गणेश मेला चक्रधर समारोह के संस्थापक सदस्यों में से एक गणेश कुशवाहा ने भी कार्यक्रम की संस्कृति को बचाए रखने के लिए अखबार में अपने लेख के माध्यम से कड़ी नसीहत दी है। उनका कहना है कि
”चक्रधर समारोह की असली शक्ति उसके मंच की भव्यता में नहीं, बल्कि उस साधना में है जो मंच पर कला को जन्म देती है। उस साधना को बचाना ही चक्रधर समारोह की आत्मा को बचाना है।”

अब आप ही तय कीजिए… क्या हम अपनी इस अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर को कुछ अफसरों की व्यक्तिगत पसंद और प्रशासनिक मनमानी की भेंट चढ़ने देंगे? चक्रधर समारोह हमारी और आपकी पहचान है; इसे अपनी गरिमा में लौटाना हम सबकी साझी जिम्मेदारी है।









