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3 साल बाद रायगढ़ कांग्रेस को अचानक याद आया ‘पर्यावरण’: राहुल गांधी के ‘सर्वे’ से जुड़ा है कुर्सी बचाने का असली खेल?

रायगढ़। कल रायगढ़ में एक बड़ा सियासी ‘फोटो-ऑप’ (Photo-Op) होने वाला है। जिला कांग्रेस की शहरी टीम ‘पर्यावरण’ के मुद्दे को लेकर जिला पर्यावरण कार्यालय का घेराव करने जा रही है। इसके लिए बाकायदा जनता से समर्थन भी मांगा गया है। लेकिन जब कोई राजनीतिक दल अचानक से ‘जन-सरोकार’ का झंडा उठा ले, तो उसके पीछे की क्रोनोलॉजी समझना बहुत जरूरी हो जाता है।

​रायगढ़ की सड़कों पर कल जो पर्यावरण बचाने का शोर गूंजेगा, क्या वह वाकई रायगढ़ के जल-जंगल और जमीन के लिए है? या फिर इसका सीधा कनेक्शन दिल्ली से चल रहे उस ‘गुपचुप सर्वे’ और ‘रिपोर्ट कार्ड’ से है, जिस पर जिला अध्यक्षों की कुर्सी टिकी हुई है? आइए इस सियासी ड्रामे की असली इनसाइड स्टोरी समझते हैं।

​अपनी सरकार में बंटे उद्योग, अब 3 साल बाद जागी संवेदना?

इस पूरे विरोध प्रदर्शन का सबसे बड़ा विरोधाभास कांग्रेस का अपना ट्रैक रिकॉर्ड है। यह एक खुला सच है कि पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में रायगढ़ जिले में उद्योगों के लिए सबसे ज्यादा जनसुनवाई (Public Hearings) हुईं। उस वक्त पर्यावरण के नियमों और विस्थापन को लेकर जो आंखें मूंदी गईं, उसका खामियाजा आज भी अंचल की जनता भुगत रही है।

​अब सत्ता से बाहर हुए 3 साल बीत चुके हैं (2026), और अचानक कांग्रेस की ‘शहरी टीम’ को पर्यावरण की याद आ गई है। सवाल यह है कि जब सत्ता में रहते हुए इन उद्योगों की नींव रखी जा रही थी, तब यह पर्यावरण प्रेम कहां था?

​असली लड़ाइयों से हमेशा नदारद रही कांग्रेस

अगर कांग्रेस को वाकई विस्थापन और पर्यावरण की इतनी चिंता थी, तो वे उन जगहों से नदारद क्यों रहे जहां असल में जमीन छीनी जा रही थी?

  • ​तमनार का विस्थापन: उद्योगों के कारण सबसे बड़ा विस्थापन तमनार क्षेत्र में हुआ। वहां के ग्रामीण आज भी अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन कांग्रेस की ग्रामीण या शहरी इकाई वहां कभी सड़क पर नहीं दिखी।
  • ​गेजमोड़ा (खरसिया) में अडानी रेल लाइन: जब अडानी की रेल लाइन के लिए खरसिया विधानसभा के गेजमोड़ा में भारी विरोध हुआ और लोग अपनी जमीन बचाने के लिए चिलचिलाती धूप में सड़क पर बैठे, तब जिला कांग्रेस कहां थी?
  • ​पूर्वांचल में सिंघल स्टील: पूर्वांचल में सिंघल स्टील का ‘ग्रीनफील्ड इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट’ लगने जा रहा है। वहां के ग्रामीण आक्रोशित हैं, लेकिन वहां भी कांग्रेस का कोई बड़ा नेता ग्रामीणों के साथ खड़ा नहीं दिखा।

​जब ग्रामीण इकाइयां और स्थानीय लोग असली लड़ाई लड़ रहे थे, तब कांग्रेस गायब थी। अब अचानक शहर के बीचों-बीच पर्यावरण कार्यालय का घेराव सिर्फ एक ‘पॉलिटिकल इवेंट’ से ज्यादा कुछ नजर नहीं आता।

​‘पर्यावरण’ का बहाना, कुर्सी बचाने का ‘सर्वे’ निशाना

सूत्रों की मानें तो इस अचानक जागे पर्यावरण प्रेम के पीछे एक बहुत बड़ा संगठनात्मक डर है। राहुल गांधी के निर्देश पर कांग्रेस आलाकमान एक ‘गुपचुप सर्वे’ करवा रहा है। इस सर्वे की टीम सभी जिला अध्यक्षों की कार्यक्षमता, उनकी सक्रियता और जनता के बीच उनकी पैठ का आकलन कर रही है। इसी रिपोर्ट कार्ड के आधार पर यह तय होना है कि किस जिला अध्यक्ष का कार्यकाल आगे बढ़ेगा और किसकी छुट्टी होगी।

​इसके अलावा, इसी महीने कांग्रेस जिला अध्यक्षों की एक अहम ट्रेनिंग भी होने वाली है। ऐसे में आलाकमान के सामने अपना ‘रिपोर्ट कार्ड’ भारी दिखाने और खुद को सड़कों पर संघर्षशील नेता साबित करने का दबाव चरम पर है।

सीधा सवाल:

राजनीति में टाइमिंग ही सब कुछ होती है। जब तमनार, पेलमा और गेजमोड़ा के ग्रामीण लाठियां खा रहे थे, पसीने बहा रहे थे, तब वातानुकूलित कमरों में बैठी कांग्रेस को उनके आंसू नहीं दिखे। अब जब ‘सर्वे टीम’ की तलवार सिर पर लटक रही है, तो पर्यावरण कार्यालय के घेराव का यह इवेंट तैयार किया गया है।

​रायगढ़ की जनता अब इतनी नादान नहीं है कि वह सत्ता की मलाई खाने वाले और सर्वे के डर से सड़क पर उतरने वाले नेताओं के बीच का फर्क न समझ सके। कल का घेराव पर्यावरण बचाने के लिए कम, और अपनी ‘गद्दी’ बचाने के लिए ज्यादा है!

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