रायगढ़। सियासत में चिट्ठियां अक्सर बहुत खामोशी से लिखी जाती हैं, लेकिन जब वो सार्वजनिक होती हैं, तो धमाका बड़ा होता है। लैलूंगा एसडीएम के जरिए भेजा गया एक ऐसा ही पत्र, इन दिनों जिले की राजनीति में तूफान लाए हुए है। ऊपर से देखने में यह सिर्फ तीन ‘बेघर’ जनप्रतिनिधियों के लिए एक सरकारी आवास मांगने की सामान्य सी अर्जी लगती है। लेकिन इसके पन्नों के बीच जो सियासी आग सुलग रही है, वह किसी भी थ्रिलर फिल्म को मात दे सकती है।

जरा विडंबना देखिए। जिन माननीयों के लिए रायगढ़ जिला मुख्यालय में छत मांगी जा रही है, वे कोई मामूली नेता नहीं हैं। रायगढ़ के सबसे बड़े सामाजिक धड़े का नेतृत्व करने वाले आदिवासी नेता है! जिनमें से एक हैं घरघोड़ा से आने वाले लोकसभा सांसद राधेश्याम राठिया, और दूसरे हैं राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह।
सोचिए, आप एक सांसद हैं। आप देश का कानून बनाने के लिए दिल्ली की संसद में बैठते हैं। आपके आगे-पीछे प्रोटोकॉल का भारी-भरकम लवाजमा है। लेकिन जरा ठहरिए! जब आप अपने ही गृह जिले रायगढ़ लौटते हैं, तो आपके पास बैठने के लिए एक अदद सरकारी कमरा तक नहीं है।
सत्ता के नए ठेकेदारों ने शायद यह भुलाने की कोशिश की है कि देवेंद्र प्रताप सिंह सिर्फ भाजपा के राज्यसभा सांसद नहीं हैं, बल्कि वे उसी रायगढ़ रियासत के ‘गोंड राजा’ भी हैं, जिसका अपना एक गौरवशाली आदिवासी इतिहास रहा है और आज उनके ही पुरखों के नाम का सरकारी आयोजन कर वाहवाही सब लूट रहे हैं! लेकिन आज हालात ये हैं कि अपनी ही रियासत में इस गोंड राजा और जनता के चुने गए आदिवासी सांसद को बैठने के लिए दो-ढाई साल के करीब का वक्त लग गया.. एक अदद से सरकारी दफ्तर की खातिर..? जिला मुख्यालय में आजतक दोनों का कार्यालय/आवास ही नहीं है..? देखा जाए तो यह अपने आप हो जाना चाहिए था, तो क्या किसी के डर से सरकारी मुलाजिमों ने उन्हें जानबूझकर नहीं दिया..? या फिर किसी के डर से उन्होंने मांगा ही नहीं..?
आखिर रायगढ़ के इन आदिवासी दिग्गजों को सड़क पर क्यों छोड़ दिया गया? जवाब है… जिले का नया ‘पावर सेंटर’!

रायगढ़ मुख्यालय के जिस ऐतिहासिक ‘सांसद बंगले’ से प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने चार बार अपनी सांसदी चलाई, जो संसद के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री रहते हुए भी उनके पास रहा, और बाद में पूर्व सांसद गोमती साय का ठिकाना बना… आज वहां से ‘सांसदों’ का बोर्ड उखड़ चुका है। यह बंगला अब रायगढ़ विधायक और प्रदेश के वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी को अलॉट कर दिया गया है। संदेश बिल्कुल साफ और निर्मम है…
ये पुराने आदिवासी रियासतें और प्रोटोकॉल गए किनारे, रायगढ़ का अब एक ही ‘बॉस’ है। सांसद जी लोग दिल्ली में शोभा बढ़ाएं, लेकिन रायगढ़ के पावर-कॉरिडोर में उनकी हैसियत सिर्फ ‘गेस्ट’ की रहेगी।
लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ है इस खत को लिखने वाला शख्स। यह अर्जी किसी आम कार्यकर्ता ने नहीं, बल्कि भाजयुमो के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रवि भगत ने लगाई है। यह वही रवि भगत हैं, जिन्होंने सड़क और पानी के मुद्दों पर वित्त मंत्री के खिलाफ आवाज उठाई थी और नतीजा यह हुआ कि हफ्ते भर के भीतर ही उनसे इस्तीफा मांगकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

अब बागी हो चुके रवि भगत ने यह चिट्ठी लिखकर कोई प्रशासनिक गुहार नहीं लगाई है, बल्कि इस नई भाजपा की लाचार पड़े पुराने आधार स्तंभों और बेबस कार्यकर्ताओं के इस नए दर्द पर.. सलीके से नमक रगड़ दिया है, जिसे पार्टी अबतक छिपाने की कोशिश कर रही थी।
रवि भगत का यह खत एक सधा हुआ राजनीतिक कटाक्ष है, जिसने पूरे प्रदेश को बता दिया है कि रायगढ़ में ‘आदिवासी स्वाभिमान’ और ‘राजशाही’ दोनों को सत्ता के नए निज़ाम के आगे कैसे बौना साबित किया जा रहा है।
सबको मालूम है कि रायगढ़ का प्रशासन अपने ‘गोंड राजा’ और आदिवासी सांसद के लिए कोई सम्मानजनक ठिकाना नहीं ढूंढ पाएगा.. अफसर भले बाहर के होंगे पर रायगढ़ के लोकल उनकी भी विडंबना समझते हैं और तब तक के लिए सत्ता के नए बॉस के खौफ से इन डमी माननीयों को अपनी जनसुनवाई किसी नुक्कड़ की चाय दुकान या रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम से ही करनी पड़ेगी।









