रायगढ़। अगर आपको देखना है कि सरकारी आयोजनों में भीड़ जुटाने के लिए मासूम बच्चों का इस्तेमाल कैसे होता है, तो शनिवार को रायगढ़ के निगम ऑडिटोरियम में हुआ कार्यक्रम इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। प्रशासन और पुलिस ने अपने-अपने कार्यक्रमों की सफलता का ‘टारगेट’ पूरा करने के लिए स्कूली बच्चों को मोहरा बना दिया। ‘एआई’ (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और ‘साइबर सेफ्टी’ जैसी भारी-भरकम बातों का ज्ञान उन बच्चों को दिया गया, जो 5 घंटे तक भूखे-प्यासे बैचैन बैठे रहे थे। कुछ बच्चों को तो कुर्सियां भी नसीब नहीं हुई जमीन में बैठे रहे।
एक ही दिन, एक ही जगह और दोतरफा प्रहार
शनिवार को निगम ऑडिटोरियम में पुलिस और प्रशासन ने अपने ‘सेवाधर्म’ का गज़ब का प्रदर्शन किया। एक ही दिन और एक ही जगह पर दो अलग-अलग कार्यक्रम थोप दिए गए। पहले पुलिस ने साइबर जागरूकता के नाम पर बच्चों को घंटों बैठाकर लघु फिल्म (शॉर्ट फिल्म) दिखाई। इसके तुरंत बाद, जिला प्रशासन ने उसी ऑडिटोरियम में ‘एआई’ (AI) की वर्कशॉप शुरू कर दी, जिसमें माननीय मंत्री जी और अन्य विशेषज्ञों ने लंबे-लंबे भाषण दिए।

सुबह 10 बजे से लेकर दोपहर 3 बजे तक, यानी पूरे 5 घंटे तक अफसर और नेता मंच से ज्ञान बांटते रहे। लेकिन शर्म की बात यह है कि इस पूरी मैराथन में मासूम बच्चों को रिफ्रेशमेंट (नाश्ता-पानी) के नाम पर कार्यक्रम ख़त्म होने तक कुछ भी नहीं दिया गया।

कुर्सी पर भाजपाई, ज़मीन पर दिखा ‘भविष्य’
तस्वीर सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता की पोल खोलती है। ऑडिटोरियम में सफेदपोश नेता, अधिकारी और पुलिस वाले आराम से गद्देदार कुर्सियों पर विराजमान थे, जबकि जिन बच्चों के लिए यह पूरा तामझाम रचा गया था, उन्हें 36 डिग्री की भीषण गर्मी और उमस के बीच 5 घंटे बिना किसी व्यवस्था के बैठा दिया गया था। इतने देर में तो, स्कूल में बच्चे दो बार ब्रेक और कितनी बार पानी पीते हैं। वहां मंच पर वीआईपी मेहमानों के लिए ठंडे पानी की व्यवस्था थी, लेकिन नीचे बैठे बच्चों के हलक सूख रहे थे। जो बच्चे ऑडिटोरियम की ऊपर वाली मंज़िल पर बैठे थे, उनके लिए तो पंखे तक ठीक से काम नहीं कर रहे थे।
रईस बच्चों को छूट, गरीबों के बच्चे बने ‘भीड़’
इस पूरे आयोजन का सबसे क्रूर चेहरा वह भेदभाव था, जो स्कूलों के बीच किया गया। शहर के बड़े और नामी स्कूलों से आए बच्चों को सुबह 10:30 बजे ही वहां से जाने की इज़ाज़त दे दी गई। शायद प्रशासन बड़े घरों के बच्चों को गर्मी और अव्यवस्था का कष्ट नहीं देना चाहता था।
लेकिन छोटे और मंझले स्कूलों के बच्चे? उन्हें महज़ इसलिए अंत तक रोक कर रखा गया ताकि ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ दिखे। प्रशासन और पुलिस के अफसरों को अपना कार्यक्रम हिट कराना था, और इसके लिए गरीब-मध्यम वर्ग के बच्चों को ‘भीड़’ की तरह इस्तेमाल किया गया।

खाली पेट कैसे समझेगा ‘एआई’ और ‘साइबर सेफ्टी’
कागज़ों और प्रेस रिलीज़ में यह कार्यक्रम भले ही बहुत ‘सफल’ और ‘हाई-टेक’ बताया जा रहा हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत बहुत डरावनी है। जो बच्चे सुबह से दोपहर 3 बजे तक बिना पानी और खाने के उमस में ज़मीन पर बैठे हों, उन्हें एक अरब डॉलर की कंपनियों (एआई यूनिकॉर्न) के सपने दिखाना भद्दा मज़ाक है।
प्रशासन को यह समझना होगा कि बच्चों को 5 घंटे तक भूखा-प्यासा रखकर उन्हें रोबोटिक या साइबर ज्ञान नहीं दिया जा सकता। आख़िर में बस यही सवाल गूंजता है कि
‘खाली पेट बच्चा कैसे समझेगा ‘एआई’ और ‘साइबर सेफ्टी’?
इस आयोजन ने बच्चों को नवाचार सिखाया हो या नहीं, लेकिन यह ज़रूर सिखा दिया कि हमारी व्यवस्था में नेताओं और अफसरों की पब्लिसिटी के सामने बच्चों की तकलीफ कोई मायने नहीं रखती।









