नई दिल्ली। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) के नियमों को लेकर जारी चर्चाओं के बीच राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है। आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने अमेरिकी कंपनियों के दबाव में आकर यूपीआई नियमों में बदलाव का रास्ता साफ किया है।
वीजा और मास्टरकार्ड के दबाव में झुकी सरकार: सुधाकर सिंह
आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर दावा किया कि यह यूपीआई की हार नहीं, बल्कि अमेरिकी दबाव के आगे झुकने की कहानी है। उन्होंने कहा कि देश में लोग वीजा और मास्टरकार्ड जैसे अमेरिकी कार्ड नेटवर्क का इस्तेमाल छोड़कर यूपीआई अपनाने लगे थे, जिससे अमेरिकी कंपनियों के कारोबार पर असर पड़ रहा था।
UPI ने Visa और Mastercard के आगे सरेंडर नहीं किया है…
बल्कि 56 इंच वाले मोदी जी ने ट्रम्प के आगे सरेंडर कर दिया है!UPI का पूरा खेल समझिए।
लोग अब Visa और Mastercard जैसे अमेरिकी कार्ड नेटवर्क का इस्तेमाल लगभग छोड़कर UPI पर आ गए थे। इससे अमेरिकी कंपनियों के कारोबार पर असर पड़ना स्वाभाविक था।
तभी आता है आका का कॉल…
अब मोदी जी को अमेरिका की बात तो माननी पड़ेगी ना!
और फिर मोदी जी नतमस्तक होकर UPI के ₹2,000 से ऊपर के व्यापारी भुगतान पर 0.4% MDR लगाने का रास्ता खोल देते हैं।
यानी जिस UPI को भारत की डिजिटल ताकत बताया गया, उसी के बड़े लेन-देन पर अब शुल्क की व्यवस्था!
वाह मोदी जी, वाह!
अमेरिका खुश, ट्रम्प खुश…
और जनता को मिला “आशीर्वाद का दिया”!यह UPI की हार नहीं है—
सुधाकर सिंह, RJD सांसद
यह मोदी सरकार की अमेरिकी दबाव के आगे झुकने की कहानी है!
सुधाकर सिंह ने आरोप लगाते हुए लिखा कि इसके बाद आए एक कॉल के चलते सरकार ने बात मान ली और 2,000 रुपये से ऊपर के व्यापारी भुगतान (मर्चेंट ट्रांजैक्शन) पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) लगाने का रास्ता खोल दिया गया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जिस यूपीआई को देश की डिजिटल ताकत बताया गया था, अब उसी के बड़े लेनदेन पर शुल्क की व्यवस्था की जा रही है।
तेजस्वी यादव ने भी डिजिटल इंडिया और टैक्स नीति पर उठाए सवाल
इस मुद्दे पर आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भी केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है। तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि पहले प्रधानमंत्री डिजिटल इंडिया का प्रचार कर रहे थे, लेकिन अब स्थिति यह है कि सरकार ने विभिन्न बुनियादी सेवाओं और व्यवस्थाओं पर टैक्स का बोझ बढ़ा दिया है।









