रायगढ़/सारंगढ़। सारंगढ़ में महानदी के मुहाने स्थित ग्राम घोटला छोटे में अडानी पावर लिमिटेड (बड़े भंडार) के फ्लाई ऐश भराव और अनुमति को लेकर उठे विवाद में नया मोड़ आ गया है। वजह है रायगढ़ क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी का बयान। पर्यावरण विभाग का कहना है कि अनुमति से पहले राजस्व विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) लिया गया था, जिसमें 300 मीटर के दायरे में बाढ़ क्षेत्र या नदी की जानकारी नहीं थी। लेकिन इस बयान ने अडानी पावर के लिए पर्यावरण विभाग की कागजी प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि इस जमीन की उपयुक्तता सिर्फ कागजी NOC से तय हुई या कोई भौतिक जांच भी की गई?

मामला क्या है..?
दरअसल सारंगढ़ बिलाईगढ़ जिले के ग्राम छोटा घोटला में रायगढ़ के बड़े भंडार स्थित अदानी पावर लिमिटेड को 1.534 हेक्टेयर भूमि पर फ्लाई ऐश डंपिंग की मंजूरी पर्यावरण विभाग के द्वारा दी गई है। स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां करीब एक दशक पहले सारा बैराज के निर्माण के दौरान बड़े स्तर पर गिट्टी की माइनिंग की गई थी। जिसके कारण यह एक विशाल गड्ढा बन गया। इसके पास ही महानदी और उपजाऊ खेत भी हैं।

अदानी पावर ने हाल ही में इसमें फ्लाई ऐश भरने की अनुमति ली है। लेकिन इसके कुछ दिन बाद ही महानदी का जलस्तर बढ़ा और पानी इस डंपिंग यार्ड के साथ-साथ आसपास के गांव के खेतों में भी पहुंचा। पानी के साथ फ्लाई ऐश पहुंचने से उनके खेतों और फसलों को भारी नुकसान हुआ है।
इस बारे में रायगढ़ क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी मानवेंद्र पांडे ने बताया कि
“अनुमति से पहले राजस्व विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) लिया गया था। विभाग के मुताबिक राजस्व अभिलेखों में 300 मीटर के दायरे में बाढ़ क्षेत्र (Flood Plain), नदी आदि होने की जानकारी नहीं थी।”
लेकिन इस बयान ने समाधान देने के बजाय कई नए और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। देखा जाए तो पर्यावरण विभाग ने अप्रत्यक्ष रूप से राजस्व विभाग पर ठीकरा फोड़ दिया हैं। लेकिन अब सवाल यह है कि जिस जमीन पर फ्लाईऐश भरी जा रही है, उसकी उपयुक्तता सिर्फ कागजी अनापत्ति के आधार पर तय हुई या कोई भौगोलिक, तकनीकी जांच भी हुई?
नियमों में 300 किलोमीटर है, तो ‘300 मीटर’ का मानक कहां से आया?
एक और बड़ा सवाल यह है कि पर्यावरण अधिकारी द्वारा बताया गया ‘300 मीटर’ का मानक आखिर किस सरकारी नियम में है?
केंद्र सरकार की 31 दिसंबर 2021 की Ash Utilisation Notification, 2021 में 300 किलोमीटर का प्रावधान ताप विद्युत संयंत्र (कोयला आधारित पावर प्लांट) से संबंधित है, जिसके तहत संयंत्र से 300 किलोमीटर की दूरी के भीतर आने वाली खदानों में राख के उपयोग/भराव की व्यवस्था की गई है। लेकिन इस अधिसूचना में नदी या बाढ़ क्षेत्र से 300 मीटर की कोई सामान्य दूरी का प्रावधान दिखाई नहीं देता।
इसके उलट, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की 2019 की फ्लाईऐश संबंधी दिशा-निर्देशों में बाढ़ क्षेत्र (Flood Plain Area) और कृषि भूमि/क्षेत्र में राख से भराव या reclamation को लेकर प्रतिबंधात्मक प्रावधान हैं।

ऐसे में सवाल सीधा है, अगर अनुमति का आधार 300 मीटर की दूरी है, तो उस 300 मीटर का कानूनी और तकनीकी आधार क्या है? और क्या इस दूरी के साथ-साथ यह भी जांचा गया कि संबंधित जमीन वास्तविक बाढ़ जोखिम या बाढ़ क्षेत्र की स्थिति में तो नहीं आती?

बाढ़ का विरोधाभास: रिकॉर्ड सही है, तो डंपिंग एरिया और खेतों तक पानी कैसे पहुंचा?
पर्यावरण विभाग का जवाब राजस्व अभिलेखों पर आधारित है, लेकिन जमीनी तस्वीर कई नए सवाल खड़े कर रही है। अब सब के मन में यक्ष प्रश्न है,
“अगर राजस्व अभिलेखों के मुताबिक 300 मीटर के भीतर कोई नदी या बाढ़ प्रभावित क्षेत्र नहीं है, तो हालिया बाढ़ में महानदी का पानी संबंधित भराव स्थल (डंपिंग यार्ड) और खेतों तक कैसे पहुंचा?”
यदि डंपिंग यार्ड में बाढ़ का पानी पहुंचा है, तो इसका सीधा मतलब है कि कागजी रिकॉर्ड और भौगोलिक सत्य में बड़ा अंतर है।
फ्लाई ऐश डंपिंग यार्ड में महानदी का पानी पहुंचने पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कागजी अभिलेखों के साथ मौके की वास्तविक भौगोलिक और जलभराव की स्थिति का भी तकनीकी आकलन किया गया था? या किसी विशेष के कहने या किसी के लिए बस यूं ही सब कुछ नजर अंदाज कर दिया गया।

बिना भौतिक सत्यापन कैसे मिली अनुमति?
राजस्व विभाग की अनापत्ति जमीन से संबंधित राजस्व स्थिति और अन्य अभिलेखों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन इससे अकेले किसी भी स्थान की पर्यावरणीय उपयुक्तता प्रमाणित नहीं होती।
2021 की फ्लाई ऐश निपटान नोटिफिकेशन में पाटने हेतु उपयुक्त खदानों की पहचान के दौरान सुरक्षा, व्यवहार्यता और पर्यावरणीय प्रदूषण जैसे पहलुओं की जांच का प्रावधान है। ऐसे में सवाल उठता है..
क्या पर्यावरण विभाग ने क्लीयरेंस देने से पहले ने मौके का भौतिक सत्यापन किया था?
क्या छोटे घोटला–भोथली क्षेत्र की इस कथित बंद खदान की फ्लाईऐश भराव के लिए उपयुक्तता का कोई तकनीकी अध्ययन कराया गया था?
क्या भराव स्थल के बाढ़ जोखिम, जलभराव, पानी के प्रवेश और भूजल पर संभावित प्रभाव का आकलन किया गया था?
यदि ऐसा कोई अध्ययन हुआ है, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही है?
और यदि ऐसा कोई तकनीकी आकलन नहीं हुआ, तो केवल राजस्व अभिलेखों और NOC के आधार पर पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील जगह में डंपिंग की अनुमति देने का आधार क्या था? अगर चूक हुई है तो इस बड़ी चूक की जवाबदेही किसकी..? अब जब वहां पानी भर चुका है तब क्या वहां फ्लाई डंप हो सकता है..??









